
jhulelal
सिंधियों के ईष्टदेव झूलेलाल ने सिंध के नरसपुर में विक्रम संम्वत 1007 चांद के दिन अवतार लिया। मिरख बादशाह के जुल्मों से तंग आकर सिंधी समुदाय ने सिंधु नदी के किनारे अन्न जल त्याग कर चालीस दिन तक उपवास किया। तब झूलेलाल भगवान ने अवतार लिया। भगवान झूलेलाल महज 13 वर्ष की आयु में ब्रहमलीन हो गए। इस अल्पायु में ही उन्होनें बचपन, जवानी एवं बूढ़े का स्वरुप दिखाया। उनके करिश्माई व्यक्तित्व के आगे मिरख बादशाह सहित सिर्फ सिंधी समुदाय ही नहीं बल्कि अन्य लोग भी उनके मुरीद हुए।
सिंधी व्यंजन हुए लोकप्रिय
सिंधी समाज ने अपनी व्यवहार कुशलता की बदौलत न.न सिर्फ सिंधी भाषा की मिठास कायम की बल्कि अन्य समाज में परंपरागत सिंधी व्यंजनों की खुश्बू भी फैलाई। दाल-पकवान, दही-कोकी, मीठी रोटी-अचार, सेयल फुल्का, ताहिरी और पापड़ एेसे व्यंजन है जिनकी खुृशबू देश की सरहदें पार कर विदेशी में भी फैल चुकी है।
Published on:
07 Apr 2016 05:13 pm
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