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जूली फ्लोरा बना अरावली का कैंसर

कभी हरियाली फैलाने के लिए बेतरतीब ढंग से लगाए गए विलायती बबूल(जूली फ्लोरा) अब धरती और पर्यावरण के लिए शूल बन गए हैं। विलायती बबूल ने अरावली पर्वतमाला समेत शहर, गांव और ढाणियों तक धरती को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है। प्राकृतिक जैव विविधता को खात्मा करने में विलायती बबूल ने धीमे जहर का काम किया है। इसके घातक परिणाम पिछले २० से २५ साल में देखने को मिल रहे हैं। देखने में यह हरे-भरे जरूर लगते हों, लेकिन पर्यावरण और मनुष्य के लिए यह कतई फायदेमंद नहीं है। सबसे घातक स्थिति यह है कि यह अपने आसपास उपयोग

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अजमेर

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Manish Singh

Dec 25, 2019

जूली फ्लोरा बना अरावली का कैंसर

जूली फ्लोरा बना अरावली का कैंसर

अजमेर वन खण्ड 199, अजमेर जिले का क्षेत्रफल 8 हजार 481 वर्गकिमी. अजमेर में वन क्षेत्र 515 वर्ग किमी. (51524.551 हेक्टयर), अजमेर के वन क्षेत्र में फैला विलायती बबूल
अजमेर. अरावली की ऊंची-ऊंची चोटियों पर छाई जूली फ्लोरा (विलायती बबूल) की हरियाली अब कैंसर साबित होने लगी है। अजमेर में जिले के 8 हजार 481 वर्ग किमी. क्षेत्रफल में 515 वर्ग किमी. पर वन क्षेत्र है। इसमें 6 रेंज में 199 वन खण्ड है। इन 6 रेंज में अजमेर, किशनगढ़, ब्यावर, नसीराबाद, सरवाड़ व पुष्कर शामिल है। हरियाली की उम्मीद से वन क्षेत्र में लगाया गया विलायती बबूल अब जंगलों को तबाह करने लगा है। इसकी झाडिय़ां ढाक, धौक, केर, औषधीय पोधे गूगल, ग्वारपाठा, सफेद आक, सफेद मूसली, शतावर, गोखरू, जंगली प्याज, जेट्रोफा, अश्वगंधा औषधीय गुणों वाली वनस्पति को निगल चुकी है। तेजी से अरावली पहाड़ी में फैले जूली फ्लोरा ने दूसरे किसी वनस्पति को पनपने ही नहीं दिया। ऐसे में पहाडिय़ों पर अब सिर्फ विलायती बबूल के सिवा कुछ नजर नहीं आता। अब सरकार व वन विभाग को जूली फ्लोरा को खत्म करने व वन संवर्धन के कदम उठाने पड़ेंगे।

कुछ नहीं पनपता
विलायती बबूल के रहते पेड़ तो होना तो दूर इसके नीचे घास भी नहीं उग सकती है। इससे पर्यावरण को भी नुकसान होता है। कटीले बबूल की झाडिय़ां जब छोटी थी तब हम अपने मवेशियों को यहां पर चराने के लिए छोड़ देते थे लेकिन इनकी पत्तियां छोटी और स्वाद में कसैली होती है। जिसे पशु भी नहीं खाते है। पूरे इलाके में इनकी झाडिय़ां इतना सघन हो गई हंै कि इनके नीचे घास तक नहीं उगती और दूसरे पेड़ भी खत्म होते जा रहे है। चरागाह तक निगल चुका है बिलायती बबूल।

जानलेवा है जुली फ्लोरा का कांटा

जूली फ्लोरा का कांटा इतना सख्त व नुकीला होता है कि गाय, भैंस के खुर तक में गड़ जाता है। ऐसे में तेन्दुए व उसके शाव तक घायल हो जाते है। नील गायें भी इनके कीकरों के झुंड में से गुजरती हैं तो उनके शरीर को भी ये नुकीले कांटे चीर देते हंै। अरावली बचाव अभियान से जुड़े लोग बताते हैं कि जैसे जैसे विलायती बबूल पका तो उसका कांटा इतना मोटा हो गया कि पशुओं के गले में फंसने लगा। गाय भैंस इन्हें खाकर मरने लगी तो किसान ने जंगलों से दूरी बना ली।

बढ़ा वन क्षेत्र

अजमेर जिले में बीते 2-3 साल में वन क्षेत्र में 13 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोत्तरी हुई है। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक देश में दो साल से 6 हजार 778 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की बढ़ोत्तरी हुई है। वनों की स्थिति पर हाल में सरकार ने द्वि-वार्षिक रिपोर्ट 2017 जारी की है जहां देश में 2015 में कुल वन क्षेत्र 7.01 लाख वर्ग किलोमीटर था। वहीं यह 2017 मं बढ़कर 7.08 वर्ग किलो मीटर था। वहं यह 2017 में बढ़कर 7.08 वर्ग किमी. हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार अजमेर जिले में भी 13 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ा है। इसमें 7 वर्ग किमी मीटर मध्य घनत्व और 6 वर्ग किलोमीटर खुला वन क्षेत्र शामिल है। जिले में वन क्षेत्र की बढ़ोत्तरी में राजस्थान पत्रिका के हरयाळो राजस्थान व मासून के दौरान विभिन्न योजनाओं में वन क्षेत्र में किए जाने वाले पौधरोपण हंै।
वाइल्ड लाइफ के लिए खतरा

जूली फ्लोरा पेड़ है तो पर्यावरण में ग्रीनरी के लिए तो अच्छा है। जहां दूसरे पौधे नहीं पनप पाते है। वहां जूली फ्लोरा यानी विलायती बबूल आसानी से ग्रोथ कर लेता है। उसे जिनता काटा जाए वह तेजी से फैलाव लेते हुए बढ़ेगा। ऐसे में उसको जड़ से निकालकर ही नष्ट किया जा सकता है। जूली फ्लोरा का सबसे बड़ा नुकसान वाइल्ड लाइफ को है। जूली फ्लोरा का कांटा जंगली जानवर के पैर में लग जाए तो पैर सड़ा देता है, जिससे जानवर की मृत्यु हो जाती है। यह जमीनी पानी को तेजी से खींचता है।
-प्रो. अरविन्द पारीक, एचओडी बॉटनी विभाग एमडीएसयू

इनका कहना है...

जूली फ्लोरा का वन क्षेत्र में कोई उपयोग नहीं है। न इससे छाया बनती है न कोई अन्य फायदा है। जूली फ्लोरा उन्मूलन के लिए मुख्यालय को तकमीना बनाकर भेजा गया है। मंजूरी मिलने पर अजमेर वन खंड से जूली फ्लोरा हटाने की कवायद की जाएगी।
-सुजीत कौर, उप वन संरक्षक