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60 साल में देख चुका दिग्गज वकीलों और मालिकों की मौत, फिर भी नहीं सुलझ रहा यह केस

इसकी सम्पत्ति के कब्जे को लेकर इस कंपनी को जमीन, भवन व मशीन लीज पर देने वाली कंपनी की अपील अब भी हाईकोर्ट में चल रही है।
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अजमेर

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raktim tiwari

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Updated: 13 May 2018, 9:15 PM IST

longest high court case in rajasthan

longest high court case in rajasthan

अजमेर/जयपुर/किशगढ़।

हाईकोर्ट ने महाराजा किशनगढ़ मिल्स (न्यू) कंपनी बंद होने को लेकर 1956 से चल रही सबसे पुरानी याचिका का निस्तारण कर दिया है। यह देशभर में किसी भी हाईकोर्ट में लम्बित सबसे पुरानी याचिका थी। हालांकि इसकी सम्पत्ति के कब्जे को लेकर इस कंपनी को जमीन, भवन व मशीन लीज पर देने वाली कंपनी की अपील अब भी हाईकोर्ट में चल रही है।

न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने महाराजा किशनगढ़ मिल्स की कंपनी याचिका को निस्तारित कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका में 1956 में दायर हुई और कंपनी बंद करने का आदेश 11 अपे्रल 1958 को हो गया। इसके बाद ओएल (ऑफिसियल लिक्वेडेटर) ने बंद होने वाली कंपनी की सम्पत्ति 11 जनवरी 2011 को महाराजा किशनगढ़ सोमयाग मिल्स कंपनी (पुरानी कंपनी) को सौंप दी। 31 दिस बर 2010 को स पत्ति से अर्जित 10 लाख 85 हजार 54 रुपए किराया भी सौंप दिया गया।

अदालती आदेश पर 27 लाख रुपए अन्य राशि का भुगतान कर दिया गया। बंद कंपनी के खाते में जमा 1 लाख 64 हजार 346 रुपए ओएल ने खर्च के लिए कॉमन पूल फंड खाते में जमा करा दिए। एकलपीठ ने पूर्व मे कब्जा खाली कराने के लिए पेश पुरानी कंपनी के प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया, जिसकी अपील खंडपीठ में ल िबत है।

एकलपीठ ने इस स्थिति का हवाला देते हुए कहा है कि अब मामले में उसके दखल के लिए कंपनी याचिका को जिंदा कने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि कंपनी पहले ही बंद हो चुकी है और सम्पत्ति पर पुरानी कंपनी का कब्जा मान लिया गया है।

1942 में लीज पर दिए ावन, मशीन

महाराजा किशनगढ़ मिल्स (ओल्ड) ने पूरा परिसर, मशीन सहित 1942 में महाराजा किशनगढ़ मिल्स (न्यू) को लीज पर दिया। नई कंपनी 1956 में बंद हो गई। ओएल ने कब्जा ले लिया और 1958 में हाईकोर्ट ने कंपनी बंद होने की प्रक्रिया पूरी कर दी।

पुरानी कंपनी, मुकदमे का नया दौर

नई कंपनी के बंद होने की प्रक्रिया समाप्त करने पर पुरानी कंपनी ने ओएल के पास आपत्ति जताई कि लीज पर दिए गए परिसर, भवन व मशीन उसे वापस दिलाए जाएं। ओएल ने प्रार्थना पत्र 1960 में खारिज कर दिया। इस पर कंपनी याचिका दायर हुई, कोर्ट ने आपत्ति सही मान ली और ओएल ने उसकी अपील की। अपील पुरानी कंपनी के पक्ष में तय हो गई। इसी बीच ओएल ने परिसर व भवन किराए पर दे दिए। 1965 में खाली परिसर पुरानी कंपनी को मिल गया। इस बीच किराएदारों ने नई दुकानें बना लीं। 1971 में पुरानी कंपनी ने बाकी कब्जे के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने 1981 के आसपास पुरानी कंपनी को तुरन्त कब्जा देने के निर्देश दिए।

इस आदेश को लेकर दोनों पक्षों ने अपील की। 1995 में पुरानी कंपनी के पक्ष में अपील तय हो गई, जिसके खिलाफ ओएल की एसएलपी 1996 में खारिज हो गई। कब्जा खाली कराने के लिए 2014 में याचिका दायर हुई, जो हाईकोर्ट से 2017 में खारिज हो गई और किराया नियंत्रण कानून के तहत कार्रवाई करने को कहा। इसकी अपील पिछले दिनों सुनवाई के लिए लगी और इस माह फिर सुनवाई हो सकती है।

100 से ज्यादा बार कोर्ट पहुंचा

महाराजा किशनगढ़ सोमयाग मिल्स (ओल्ड) के प्रतिनिधि सत्यनारायण गर्ग ने कहा कि शुरुआत में नारायण दास मेहता व बल्ल ा दास पुरोहित कंपनी के प्रबंध निदेशक व निदेशक थे। फिर रामस्वरूप कंदोई एमडी बने, 1997 में उनका निधन हो गया। गर्ग ने कहा, वे इस मामले में 100 से अधिक बार कोर्ट आ चुके। अब उनके बेटे ाी कोर्ट की कार्रवाई में मांग लेते है। इस दौरान मुकुट बिहारी लाल ाार्गव, चिरंजी लाल अग्रवाल, गुमान मल लोढ़ा,व सागर मल मेहता जैसे कई बड़े वकील इस प्रकरण में पैरवी कर चुके।

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