
प्रतीकात्मक चित्र।
दिनेश कुमार शर्मा
अजमेर (Ajmer news). जिले में जैविक खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ा है। इससे जहां कृषि के दौरान रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों पर निर्भरता कम हुई है, वहीं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिल रहा है। किसान प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर उपयोग करते हुए कम लागत वाली पर्यावरण अनुकूल खेती को महत्व दे रहे हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता में बढ़ोतरी के साथ-साथ किसानों की आय में भी सुधार हो रहा है।
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की योजना ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन’ में किसानों के पंजीयन के आंकड़े बताते हैं कि किसान जैविक खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अजमेर जिले में वर्ष 2025-26 में करीब 7 हजार किसानों को योजना में लाभान्वित किया गया है।
योजना में 2000 रुपए सरकार की ओर से जैविक आदान उत्पादन इकाई स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है। इसके लिए प्रथम शुरूआत 0. 4 हैक्टेयर क्षेत्र से की जा सकती है। योजना का उद्देश्य रसायनमुक्त खेती को बढ़ावा देना, खेती की लागत कम करना और देसी गाय-आधारित कृषि को प्रोत्साहित करना है।
योजना में लघु, सीमांत, महिला या कोई भी पट्टेदार किसान आवेदन कर सकता है। उसके पास कृषि योग्य भूमि होना जरूरी है। उसे प्राकृतिक खेती अपनाने की सहमति देनी होगी। कृषि विभाग में पंजीकरण कराना होगा।
आवेदक के पास कम से कम एक देशी (स्वदेशी) गाय का होना अनिवार्य है। यह योजना पूरी तरह से गाय-आधारित खेती पर केंद्रित है। इसके लिए स्वदेशी नस्ल की गाय का गोबर और गोमूत्र ही प्राथमिक इनपुट माने जाते हैं।
इसमें प्रशिक्षण व तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है। किसानों को प्राकृतिक खेती की विधियों जीवामृत, घनजीवामृत, बीजामृत आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है। कृषि कार्य में रासायनिक खाद व दवाइयों पर खर्च घटता है। जैविक कार्बन व सूक्ष्मजीव गतिविधि बढ़ने से मिट्टी की सेहत में सुधार होता है। प्राकृतिक उत्पादों के ब्रांडिंग व विपणन में सहयोग किया जाता है।
जीवामृत का उपयोग मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसे गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन, मिट्टी और पानी से तैयार किया जाता है, जिसकी तैयारी अवधि लगभग 48 घंटे होती है। इसका उपयोग 200 लीटर घोल प्रति एकड़ सिंचाई या ड्रिप के माध्यम से किया जाता है। इससे मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की वृद्धि होती है और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होती है।
बीजामृत का उपयोग बीज उपचार के लिए किया जाता है। इसे गोबर, गोमूत्र, चूना, मिट्टी और पानी से 24 घंटे में तैयार किया जाता है। उपयोग के लिए बीजों को 30 मिनट तक इसमें डुबोकर छाया में सुखाया जाता है। इससे अंकुरण बेहतर होता है और बीजजनित रोगों का नियंत्रण होता है।
घनजीवामृत का उपयोग कम पानी वाले क्षेत्रों में पोषण देने के लिए किया जाता है। इसे गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी से 2-3 दिनों में (सुखाने सहित) तैयार किया जाता है। इसका उपयोग 100-200 किलोग्राम प्रति एकड़ मिट्टी में मिलाकर किया जाता है। इससे पौधों को धीमी गति से पोषक तत्व मिलते हैं।
अग्निअस्त्र का उपयोग कीट नियंत्रण के लिए किया जाता है। इसे गोमूत्र, नीम पत्ती, लहसुन और हरी मिर्च को उबालकर 48 घंटे में तैयार किया जाता है। इसका उपयोग 5 लीटर घोल को 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव के रूप में किया जाता है। यह तना छेदक और इल्ली जैसे कीटों को नियंत्रित करने में प्रभावी है।
ब्रह्मास्त्र का उपयोग व्यापक कीट नियंत्रण के लिए किया जाता है। इसे गोमूत्र, नीम, धतूरा, आक और करंज की पत्तियों को उबालकर 48 घंटे में तैयार किया जाता है। इसका उपयोग 3-5 लीटर घोल को 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव के रूप में किया जाता है। यह विभिन्न प्रकार के कीटों पर प्रभावी नियंत्रण करता है।
प्राकृतिक खेती में इन जैविक तैयारियों का उपयोग टिकाऊ कृषि प्रणाली के लिए किया जाता है। यह देसी संसाधनों पर आधारित होती है और निरंतर प्रक्रिया के रूप में अपनाई जाती है। इसके नियमित उपयोग से खेती की लागत कम होती है, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है और फसलों की उत्पादकता व गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
Published on:
06 Apr 2026 10:57 pm
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