अजमेर. अभावों में भी प्रतिभा कैसे निखारी जा सकती है, इसका जीता जागता उदाहरण है हासियावास गांव।यहां की लड़कियों में फुटबॉल के प्रति जुनून ही है जो अभावों में भी उनका हौसला टूटने नहीं दे रहा। गांव की बेटियों ने अपने जज्बे से राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सफलता का परचम लहराया है।सुबह 5.30 बजे मैदान पर
गांव की लड़कियां सुबह 5.30 बजे एवं शाम को स्कूल के बाद सीधे मैदान पर पहुंच जाती हैं। कई लड़कियां नंगे पांव अभ्यास करती हैं। कुछ के पास किट नहीं है। मैदान के आस पास कंटीली झाडि़यां के चलते बॉल के बार-बार पंचर हो जाती है। फिर भी उनके जोश में कोई कमी नहीं आती। मिट्टी से भरे मैदान पर अभ्यास करके ही गांव की छह लड़कियों ने स्कूली राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में गांव का नाम चमकाया है। ओपन में जिला व राज्य स्तरीय कई प्रतियोगिताओं में भी कमाल दिखा चुकी हैं।जल्दी शादी से छुटकारा
गांव में फुटबॉल के कारण अब बालिकाओं की जल्दी शादी नहीं करते हैं। गौना भी नहीं करते हैं। फुटबॉल के साथ हम पढ़ाई पर भी ध्यान दे रहे हैं। गांव में हर लड़की फुटबॉल में करियर बनाना चाहती है।
सपना, सीनियर खिलाड़ी
पहले मिलतीं फब्तियां, अब सभी का मुंह बंद
फुटबॉल खेलने के लिए शॉर्ट पहनना पड़ता है। शुरू में लड़कियां शॉर्ट (नेकर) पहनकर मैदान में उतरती थीं तो लड़के फब्तियां कसते थे। कुछ लोग बोलते थे कि कपड़े पूरे पहना करो, लेकिन फुटबॉल में जब जीतने लगे, पुरस्कार मिलने लगे तो लड़कों के मुंह बंद हो गए। अब हर व्यक्ति अपनी बेटी को मैदान में खेलने के लिए भेजते हैं।
ममता, सीनियर खिलाड़ी
मैदान अच्छा होना चाहिए
मैदान अच्छा होना चाहिए। बबूल के पेड़ एवं कंटीली झाडि़यां हटानी चाहिए। इससे आए दिन बॉल पंचर होने की समस्या कम हो पाएगी। मैदान में मिट्टी होने से किक भी सही नहीं मार सकते हैं। मैच घास के मैदान पर होते हैं, ऐसे में तैयारी के लिए भी घास का मैदान होना चाहिए।
सुमन, फुटबॉल खिलाड़ी
ना शूज ना गलब्ज
कई लड़कियों के पास शूज नहीं हैं। किट भी एक-एक ही है। गोलकीपर के लिए गलव्ज भी तीन-चार जोड़ी होनी चाहिए, जिससे अन्य गोलकीपर भी तैयार हो सकें। माता-पिता खेती करते हैं। सभी खिलाड़ी खरीद कर सामान नहीं ला सकते हैं।
कंचन, गोलकीपर