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सन्तों की दया से धर्म-अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति – संत उमाकांत

यह देव दुर्लभ अनमोल मनुष्य शरीर का असली उद्देश्य जीतेजी प्रभु को पाना है। श्मशान घाट पर शरीर को मुक्ति मिलती है आत्मा को नहीं। मौत को हमेशा याद रखो क्योंकि एक दिन सब की आती है।

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सन्तों की दया से धर्म-अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति - संत उमाकांत

सन्तों की दया से धर्म-अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति - संत उमाकांत

पुष्कर.

मेला मैदान में संत उमाकांत ने अनुयायियों को नशा सेवन व मांस भक्षण नहीं करने की शपथ दिलाते हुए नामदान किया तथा महिमा बताई। निरंजन, ओम, रा-रम, सो-हम, सतनाम, सहित आदिकाल के पांच नामों का उच्चारण करवाया।

उन्होंने कहा कि निरंजन ज्योति स्वरूप है। दीपक की तरह है। दुनिया का कोई बाजा बिना बजाए नहीं बजता है लेकिन ऊपर के बाजे हमेशा 24 घण्टे बजते हैं। ओम सूर्य का, रा- रम चंद्रमा है। सतनाम प्रकाश स्वरूप है। जयगुरुदेव के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी संत उमाकांत ने कहा कि मनुष्य शरीर किराए का मकान है। सांसों की पूंजी खत्म होने पर सबको एक दिन खाली करना पड़ेगा।

यह देव दुर्लभ अनमोल मनुष्य शरीर का असली उद्देश्य जीतेजी प्रभु को पाना है। श्मशान घाट पर शरीर को मुक्ति मिलती है आत्मा को नहीं। मौत को हमेशा याद रखो क्योंकि एक दिन सब की आती है। उन्होंने कहा कि आत्मा को मुक्ति परमात्मा के पास पहुंच जाने पर मिलती है जो केवल समर्थ गुरु ही दिला सकते हैं।

कोटि जन्मों के पुण्य जब इकट्ठा होते हैं तब सन्त दर्शन, सतसंग और नामदान का लाभ मिलता है। सन्तों की दया से अर्थ, धर्म, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि महात्माओं के दरबार में जाति-पाती ऊंच-नीच के भेदभाव को कोई स्थान नहीं दिया जाता है।