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शक, वहम एवं मतिभ्रम की अजीब बीमारी है सिजोफ्रेनिया

वल्र्ड सिजोफ्रेनिया डे विशेष कहते हैं दुनिया में शक, वहम का इलाज बहुत मुश्किल है। अगर समय रहते इसका इलाज नहीं होता है तो हालात बुरे हो सकते हैं। इसी मर्ज को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से हर वर्ष 24 मई को ‘वल्र्ड सिजोफ्रेनिया डे’ मनाया जाता है सिजोफ्रेनिया मेंटल हेल्थ से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है। जिसका असर व्यक्ति के व्यवहार और भावनाओं पर पड़ता है। इस बीमारी में मरीज अपने मन के भाव चेहरे पर प्रकट नहीं कर पाता है। आंकड़ों के मुताबिक, प्रति एक हजार लोगों में से तीन लोग इस बीमारी के शिकार हो

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अजमेर

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Dilip Sharma

May 24, 2022

name of SMS of Jaipur will be included in the famous hospitals

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धौलपुर. कहते हैं दुनिया में शक, वहम का इलाज बहुत मुश्किल है। अगर समय रहते इसका इलाज नहीं होता है तो हालात बुरे हो सकते हैं। इसी मर्ज को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से हर वर्ष 24 मई को ‘वल्र्ड सिजोफ्रेनिया डे’ मनाया जाता है।

क्या है साइजोफ्रेनिया

सिजोफ्रेनिया मेंटल हेल्थ से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है। जिसका असर व्यक्ति के व्यवहार और भावनाओं पर पड़ता है। इस बीमारी में मरीज अपने मन के भाव चेहरे पर प्रकट नहीं कर पाता है। आंकड़ों के मुताबिक, प्रति एक हजार लोगों में से तीन लोग इस बीमारी के शिकार होते हैं।

क्या है लक्षण डिल्यूजन : इसमें व्यक्ति को लगता है कि कोई उसे मारना चाहता है। उसके खिलाफ कोई साजिश चल रही है और सभी लोग मिले हुए हैं। उसे लगता है कि कोई उसके खाने में जहर न मिला दे या फिर पुलिस उसके पीछे पड़ी है। अक्सर उसे लगता है कि लोग उसके बारे में ही बात कर रहे हैं या उसे देखकर हंस रहे हैं। हैल्लुसिनेशन : कोई कुछ नहीं बोलता, तो भी मरीज को आवाजें सुनाई पड़ती है। वह कान लगाकर बातें सुनने की कोशिश करने लगता है। कई बार तो उसे वे चीजें भी दिखाई देने लगती हैं, जो वास्तव में होती ही नहीं।
सामाजिक रूप से एकाकीपन: इस बीमारी में व्यक्ति की भावनाएं खत्म होने लगती है। उन्हें दुनिया और यहां तक कि परिवार से भी मतलब नहीं रह जाता। उनके चेहरे पर न्यूट्रल भाव रहता है, न दुख, न ही खुशी। वे सामाजिक रूप से लोगों से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते। अकेलापन अच्छा लगने लगता है। घूमने की इच्छा खत्म होने के अलावा किसी काम में मन नहीं लगता। ऐसे मरीज अकेले में बातें करते हैं। ब्रश करने, नहाने जैसी सामान्य दिनचर्या भी भूल जाते हैं। ऐसे मरीजों को नशे की भी लत लग जाती है।

क्यों होती है ये बीमारी

दिमाग का पहला हिस्सा (फ्रंटल लॉब) और बीच का हिस्सा (मिड ब्रेन) इस बीमारी से प्रभावित होते हैं। दोनों हिस्सों में केमिकल बदलाव के कारण यह बीमारी हो सकती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इस बीमारी में मिड ब्रेन में डोपामाइन का स्तर ज्यादा हो जाता है, जबकि फोरब्रेन में इसकी कमी हो जाती है। फोरब्रेन में सेरॉटोनिन की मात्रा भी कम हो जाती है। दरअसल, दिमाग के एक्टिव रहने में मददगार डोपामाइन और सेरॉटोनिन की तरह ग्लूटामेट की मात्रा भी असंतुलित हो जाती है। सोचने की क्षमता, अपनी भावनाओं और व्यवहार को नियंत्रित करने में इन हार्मोन्स का अहम रोल होता है। इनमें असंतुलन के कारण यह बीमारी होती है।

इनका कहना है
समय पर इलाज है जरूरी

मनोचिकित्सक बताते हैं कि इस बीमारी का समय से इलाज न हो तो खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है। व्यक्ति अपना संतुलन खो देता है और अपना ही दुश्मन बन जाता है। खुद की हत्या के प्रयास जैसे कई उदाहरण देखे गए हैं। स्थिति बहुत गंभीर हो जाए तो गुस्से पर संतुलन नहीं रहने से मरीज घर के किसी सदस्य या अन्य लोगों की हत्या भी कर सकता है। समय पर इलाज ना मिलने पर व्यक्ति का फोकस पढ़ाई, जॉब, करियर, फैमिली किसी भी चीज पर नहीं रहता।
डा. सुमित मित्तल, मनोरोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल, धौलपुर।