अजमेर /ब्यावर. शहर में बने तिल के व्यंजन (Sesame dishes) ब्यावर ही नहीं बल्कि देश भर में प्रसिद्ध है। यही कारण है कि इनकी बिक्री साल भर होती है। सर्दी (winter 2020) और मकर संक्रांति पर्व (Makar Sankranti festival) पर तिल से बने व्यंजन की मांग व बिक्री बढ़ जाती है। यहां पर करीब पच्चीस थोक विक्रेता और सौ से ज्यादा फुटकर विक्रेता है। तिल से व्यंजन बनाने में करीब तीन सौ से ज्यादा लोगों को साल भर रोजगार मिलता है। खास बात यह है कि यहां तिल से बने विभिन्न प्रकार के व्यंजन मशीनों से नहीं बल्कि हाथों से तैयार होते है। शहर के हलवाई गली, नृसिंह गली, रोडवेज बस स्टैंड, चांगगेट अंदर व बाहर, सेंदड़ा रोड, सेदरिया सहित विभिन्न क्षेत्रों में तिल के व्यंजन बनाने के कारखाने है। सर्दी के कारण इनकी बढ़ी मांग के चलते रात दिन कारीगर जुटे है और निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है। मकर संक्रान्ति पर्व के मध्यनजर तिलपट्टी के अग्रिम ऑर्डर की बुकिंग के चलते व्यवसायियों पर समय पर माल सप्लाई का दबाव बना हुआ है। दूर-दराज क्षेत्रों में जाने वाली सप्लाई को ट्रांसपोर्ट आदि के माध्यम से गंतव्य स्थान के लिए बुक करवाया जा रहा है।
विदेशों में भी ब्यावर की धाक
तिलपट्टी का स्वाद देश ही नहीं बल्कि सात समुंदर पार विदेशी लोगों की जुबान पर भी चढ़ चुका है। देश के बाहर रहने वाले भारतीयों की ओर से यहां से ब्यावर की तिलपट्टी मंगवाई जाती है। मकर संक्रान्ति पर्व पर तिलपट्टी की सबसे अधिक खपत होती है।
सर्दी में बढ़ती मांग व खपत
वैसे तो ब्यावर में साल भर ही तिल के बने व्यंजनों का कारोबार होता है, लेकिन सर्दी में इसकी खपत अधिक व गर्मी में खपत कम होती है। गर्मी के दिनों में पन्द्रह थोक विक्रेता व करीब पचास खुदरा व्यापारी काम करते है। इसमें करीब डेढ़ सौ से दो सौ आदमी काम करते है। वहीं सर्दी के दिनों मेें थोक विक्रेता पच्चीस व खुदरा विक्रेता सौ से ज्यादा हो जाते है। इसमें करीब तीन सौ आदमियों को रोजगार मिल जाता है। जहां आम दिनों में एक व्यापारी औसतन दो सौ किलो प्रतिदिन तिल के व्यंजन बनाता है, वहीं खपत और मांग बढऩे से इन दिनों सर्दी में व्यापारी पांच सौ से छह सौ किलो प्रतिदिन व्यंजन तैयार कर रहे हैं।
ऐसे होता है पापड़ का निर्माण
पापड़ बनाने के लिए तिल को साफ कर भिगोया जाता है। भीगे तिल को सुखाने के बाद उसकी कुटाई कर बड़े कढ़ाव में सिकाई की जाती है। इसके बाद इसकी सफाई कर फूस बाहर निकाला जाता है। शक्कर की चासनी बनाते समय उसमें नींबू डालकर यह चासनी कड़ाव में रखे तिल में डालकर उसके लोये बनाए जाते हैं। लोये बनने के तत्काल बाद वहां मौजूद कारीगर इसे रोटी की भांति बेलन से बेल देते हैं। इलायची वाली तिलपट्टी के लिए चासनी डालने से पूर्व तिल में इलायची के दाने डालने होते हैं वहीं पिस्ता इलायची वाली तिलपट्टी तैयार करने में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती है।