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अपने घर में ही हो रही इन बेजुबानों की बेकद्री, केवल फोटो का सब्जेक्ट बने यह राज्य पशु

कहने को वो रेगिस्तान का जहाज है और उसे राज्य पशु भी घोषित किया गया है, लेकिन उसका अस्तित्व ही खतरे में है। उसकी उपयोगिता अब बेहद सीमित हो गई है।

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raktim tiwari

Nov 04, 2016

state animal camel

state animal camel

कहने को वो रेगिस्तान का जहाज है और उसे राज्य पशु भी घोषित किया गया है, लेकिन उसका अस्तित्व ही खतरे में है। उसकी उपयोगिता अब बेहद सीमित हो गई है। वह सिर्फ अब सैलानियों के कैमरों के लिए फोटो का सब्जेक्ट रह गया है। यह भी हो सकता है कि अगले 15-20 वर्षों बाद वह राजस्थान में ही दुर्लभ प्रजाति के जीवों में शुमार हो जाए।

पुष्कर अंतरराष्ट्रीय मेला-2016 शुरू हो चुका है। हर वर्ष यहां आने वाले ऊंटों की संख्या घटती जा रही है और पशुपालकों (शंकरलाल, सुरेन्द्र, मोहन, रामलाल आदि) की मानें तो अब गाय, बकरी या मुर्गी पालना ज्यादा बेहतर सौदा है।

इस मेले में ज्यादातर पशुपालक भीलवाड़ा, उदयपुर, नागौर, पाली, राजसमंद जिलों से आते हैं और जितने ऊंट लेकर आते हैं, उनमें से बमुश्किल ही कोई ऊंट बिक पाता है। उनका कहना है कि सरकार ने ऊंट को राज्य पशु तो घोषित कर दिया, लेकिन इसके पालन के लिए कोई आर्थिक मदद नहीं देती है।

क्यों है महंगा सौदा...।

एक ऊंट की सामान्यत: कीमत अधिकतम 10-12 हजार तक जाती है। जबकि अच्छे वजन के बकरों की कीमतें 20 से 40 हजार के बीच तक जाती है। भैंसों की कीमत भी करीब 50 हजार से शुरू होकर डेढ़ लाख तक होती है। अच्छी नस्ल की गायों की कीमत भी ऊंट से कई बेहतर मिलती है।

क्यों खत्म हो गया ऊंट का रूतबा...।

1. रेगिस्तानी, पहाड़ी, मगरे आदि दुर्गम क्षेत्रों में यातायात का एकमात्र साधन था, लेकिन अब बेहतर सड़कें और वाहनों की मौजूदगी ने इसे पीछे धकेल दिया है

2. सेना, बीएसएफ, पुलिस और अन्य सरकारी विभागों में इसकी भर्ती होती थी, अब सिर्फ बीएसएफ में ही है और वह भी बेहद कम

3. दूध की मात्रा कम होती है। ऐसे में गाय-भैंस से मुकाबला नहीं किया जा सकता

4. खेती में भी अब ट्रेक्टर के आने के बाद बैलों की तरह ऊंट भी गैर जरूरी हो गए हैं

5. इसके मांसाहार पर रोक होने से वहां भी कोई उपयोग नहीं रह गया है

6. सरकारी वन क्षेत्रों में इसे चराने पर रोक है और चरागाह तेजी से खत्म हो गए हैं। ऐसे में इतने बड़े जीव के चारे-पानी के प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है

क्या हो सकते हैं बेहतरी के प्रयास...।

ऊंटनी के दूध में मधुमेह, बीपी, नेत्ररोग से लडऩे के खास क्षमता है। साथ ही शरीर को ऊर्जावान बनाता है। ऐसे में इसके दूध और सह-उत्पादों पर पर्याप्त शोध किए जाएं। उसकी मार्केटिंग हों और शहरी बाजारों तक उन्हें पहुंचाया जाए तो पशुपालकों में फिर से ऊंटपालन के प्रति रूझान जाग सकता है।