
रक्तिम तिवारी /अजमेर. सरकारों के बदलने से पाठ्यक्रमों में परिवर्तन की परम्परा सही नहीं है। देश की मांग, रोजगार और विद्यार्थियों- की आवश्यकता के अनुसार पाठ्यक्रम बनने चाहिए। यह बात राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक और यूनेस्को में कार्यकारी बोर्ड के भारतीय प्रतिनिधि प्रो. जे. एस. राजपूत ने शुक्रवार को पत्रिका से खास बातचीत में कही।
प्रो. राजपूत ने कहा कि पाठ्यक्रम में बदलाव सतत प्रक्रिया है, लेकिन निरर्थक पाठ्यक्रमों को पढ़ाना विद्यार्थियों के साथ खिलवाड़ है। सरकारों के बदलने मात्र से पाठ्य पुस्तकों व पाठ्यक्रमों को एकाएक बदलना गलत है। विद्यार्थियों पर कोई विशेष विचारधारा नहीं थोपी जाए। भारत में तो पांच-सात साल में पाठ्यक्रम बदलते है, जबकि दुनिया के विकसित देशों में दो-तीन साल में नए पाठ्यक्रम लागू होते रहते हैं।
स्कूलों का एकीकरण गलत
स्कूलों के एकीकरण को गलत ठहराते हुए प्रो. राजपूत ने कहा कि सरकार को दूसरे विकल्प ढूंढने चाहिए। इसकी बजाय तीसरी-पांचवीं तक के स्कूल को ग्राम पंचायत या जिला परिषद के सहारे चलाया जा सकता है। एकीकरण व्यवस्था में त्वरित सुधार का माध्यम नहीं है।
क्यों पढ़ाए जाएं निरर्थक कोर्स
कॉलेज और विश्वविद्यालयों में निरर्थक कोर्स पढ़ाने के सवाल पर प्रो. राजपूत ने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों की विद्या परिषद-प्रबंध मंडल-सीनेट को इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। तकनीकी और कौशल विकास आधारित पाठ्यक्रमों को बढ़ावा दिए बगैर बेरोजगारी खत्म करना मुश्किल है।
नहीं मिल सकते जोशी जैसे मंत्री…
पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी के विद्यार्थी रहे प्रो. राजपूत ने बताया कि देश को उनके जैसे शिक्षक और मंत्री नहीं मिल सकते। एनसीईआरटी के तत्कालीन पाठ्यक्रम में बदलाव के प्रारूप को डॉ. जोशी ने स्वयं पढकऱ मंजूरी दी थी।