
केकड़ी (kekri) में दो जैनाचार्यों का ससंघ मिलन
अजमेर. संत तो बहती दरिया है। जो एक स्थान पर नहीं टिकते। केवल चातुर्मास पर ही जैन संत (jain sant) विहार नहीं करते। इन दिनों दिगम्बर जैन संत मंगल विहार कर जगह-जगह जैन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार,श्रावक-श्रावकों को धर्म से जोडऩे व बच्चों को संस्कारित करने में जुटे हैं। केकड़ी (kekri) में शुक्रवार को दो जैनाचार्यों का मिलन हुआ तो श्रावक भावुक हो उठे। हजारों लोगों की उपस्थिति व जयकारों के बीच आचार्य शशांक सागर एवं आचार्य विभव सागर का ससंघ मिलन देख जैन संस्कृति जीवंत हो उठी। पचरंगी केसरिया पताकाएं लहराई। जयघोष की गूंज होती रही। जैन मुनि आपस में गले मिलते रहे। यह दृष्य कभी-कभी देखने को मिलता है। इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी हजारों श्रावक-श्राविकाएं बने। इस दौरान कोई मोबाइल पर फोटो कैद करने में जुटा रहा तो कोई वीडियों बनाते दिखा।
स्वागत (wencome) की रही होड
केकड़ी के सकल दिगम्बर जैन समाज (digamber jain samaj) ने दोनों जैनाचार्यों का ससंघ स्वागत किया। पुष्पवर्षा से सडक़ें अट गई। श्रावकों में मुनियों के पाद-प्रक्षालन की होड सी लगी रही। कई जगह स्वागत गेट (gate) बनाए गए। प्रवक्ता रमेश जैन ने बताया कि आचार्य विभव सागर निवाई में चातुर्मास पूरा होने के बाद शुक्रवार सुबह ससंघ केकड़ी पहुंचे। केकड़ी में चातुर्मास के लिए विराज रहे आचार्य शशांक सागर ने जयपुर रोड पर बाबा की कुटिया समीप पहुंच कर संतों की अगवानी की। आचार्य विभव सागर से गले मिलकर केकड़ी की धन्य धरा पर स्वागत किया।
नैतिकता में गिरावट चिंता का विषय
दिगम्बर जैन संतों (digambar jain sant) के महामिलन के बाद बण्डबाजे से शोभायात्रा निकाली गई जो बोहरा कॉलोनी स्थित नेमीनाथ मंदिर पहुंच कर विसर्जित हुई। शोभायात्रा में महिलाओं ने घोष वादन कर समां बांध दिया।
नेमीनाथ मंदिर पर धर्मसभा में आचार्य शशांक सागर ने कहा कि आज के समय में व्यावहारिकता एवं नैतिकता समाप्त हो रही है जो चिंता का विषय है। अलग-अलग विचारधाराओं को एकता के सूत्र में पिरोने से बहुत बड़ा गुलदस्ता तैयार हो सकता है। साधु-संत एक साथ मंच पर आकर बैठ जाते हैं तो समाज को उपदेश देने व एकता की बात कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। हर समाज और हर सम्प्रदाय की अपनी-अपनी परम्परा रही है, परन्तु प्रेम का व्यवहार सबसे बड़ा प्रतीक है।
समाज में एकता की जरूरत
आचार्य विभव सागर ने कहा कि जैन धर्म की संस्कृति अत्यंत प्राचीन है और इसकी अपनी परम्पराएं रही है। समाज में एकता की भावना का सूत्रपात करने की आवश्यकता है। इसमें संत समुदाय बहुत बड़ा योगदान कर सकते हैं। लोग संत समागम के लिए तरसते है।
इससे पहले मुकेश जैन संवारिया ने आचार्यश्री के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्वलित किया। चन्द्रकला जैन ने मंगलाचरण गीत प्रस्तुत किया। संचालन महावीर प्रसाद सिंहल ने किया। शाम को आरती एवं आनन्द यात्रा का कार्यक्रम हुआ।
Published on:
23 Nov 2019 12:17 am
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