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कारगर है शरीर के चार तत्वों पर आधारित यूनानी चिकित्सा पद्धति

अजमेर. यूनानी उपचार पद्धति दवा, आहार, औषधीय पौधों व व्यायाम थैरेपी से असाध्य रोगों के उपचार में कारगर है। यूनान (ग्रीस) में 2500 साल पहले शुरू हुई चिकित्सा पद्धति भारत में 10वीं शताब्दी में आई। अजमेर के आजाद पार्क में चल रहे आरोग्य मेले में यूनानी चिकित्सकों व उनकी टीम से रविवार को ‘राजस्थान पत्रिका’ […]

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अजमेर

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Dilip Sharma

Feb 16, 2025

arogya mela

अजमेर. यूनानी उपचार पद्धति दवा, आहार, औषधीय पौधों व व्यायाम थैरेपी से असाध्य रोगों के उपचार में कारगर है। यूनान (ग्रीस) में 2500 साल पहले शुरू हुई चिकित्सा पद्धति भारत में 10वीं शताब्दी में आई। अजमेर के आजाद पार्क में चल रहे आरोग्य मेले में यूनानी चिकित्सकों व उनकी टीम से रविवार को ‘राजस्थान पत्रिका’ ने विशेष बातचीत कर इस पद्धति से इलाज के उपायों पर बातचीत की।यूनानी चिकित्सक डॉ मोहम्मद रोशन ने बताया कि इस पद्धति से रोग निदान के चार वैज्ञानिक सिद्धांत हैं। इसमें मरीज को किसी भी प्रकार के साइड इफेक्ट का खतरा नहीं रहता व जल्द उपचार होता है।

इसमें मांस पेशियों व जोड़ों में दर्द, सरवाईकल, न्यूरो समस्या, रक्त प्रवाह, शूगर, बालों का झड़ना, उदर रोग, त्वचा व श्वसन रोग आदि के उपचार संभव है।

यूनानी उपचार के प्रकार

- रेजिमेंटल थेरेपी (व्यायाम, मालिश, तुर्की स्नान आदि) कपिंग पद्धति।

-आहार चिकित्सा (विशिष्ट आहार योजना)- फार्माकोथेरेपी (दवाएं मुख्य रूप से पौधों पर आधारित होती हैं)।

- सर्जरी।यूनानी चिकित्सा की विशेषताएं

- चार द्रव्यों (कफ़, रक्त, पीला पित्त, और काला पित्त) के आधार पर रोगों का निदान- मानव शरीर के चार तत्वों (आग, जल, पृथ्वी, और वायु) के आधार निदान

- यूनानी चिकित्सा में, दवाओं का स्वभाव ( ठंडा, गर्म, सूखा और नम)

स्वभाव-प्रकृति के आधार पर उपचार

हर व्यक्ति का स्वभाव ठंडा, गर्म, सूखा या नम होता है। यूनानी चिकित्सा में प्राकृतिक दवाओं और प्राकृतिक उपचार विधि का इस्तेमाल किया जाता है।

जड़ी-बूटी, खनिज से औषधी निर्माण

प्रभारी डॉ मोहम्मद रोशन ने बताया कि औषधियां बनाने में जड़ी-बूटियां, खनिज पदार्थों जीरा, सौंफ, अजवाईन, इलायची लौंग का उपयोग होता है। बीमारियों की जांच नब्ज़, नाखून, जीभ, त्वचा, मल-मूत्र देखकर की जाती है। मन और शरीर के बीच संतुलन जरुरी है जिससे उपापचय प्रक्रिया तेजी से कार्य कर सके। उन्होंने बताया कि दवाओं में गोली, चटनी व शर्बत या सिरप यानी खमीरा, माजून व ज्वारिश के रूप में दी जाती है। माजून में स्वर्ण, रजत आदि से दवाएं बनती हैं। शिविर में डॉ शमशुददीन, डॉ जुबेर, डॉ नाजिया खान, डॉ मतीन, डॉ शमीम खान, डॉ परवीन शेख, डॉ असद्दुल्ला खां सेवा दे रहे हैं।

अरब से भारत में आई पद्धति

भारत में यूनानी चिकित्सा पद्धति अरब से आई और जल्दी ही भारत में रच-बस गई। भारत में इसकी शुरुआत 10वीं शताब्दी से मानी जाती हैं। भारत में इसे अपनाने में हकीम अजमल खान को श्रेय जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन से 1976 में मान्यता मिलने के बाद प्रतिवर्ष 11 फरवरी को यूनानी चिकित्सा दिवस मनाया जाता है।