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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: पति के पास पर्याप्त आय है तो पत्नी भरण-पोषण की है हकदार

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया और कहा कि पत्नी को भरण-पोषण देने के लिए सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कोई रोक नहीं है। मामले में न्यायमूर्ति बृज राज सिंह की खंडपीठ के अनुसार, इस आधार पर भरण-पोषण से इनकार करना बहुत कठोर होगा कि पति के पक्ष में वैवाहिक अधिकारों की बहाली का फरमान पारित किया गया है।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: पति के पास पर्याप्त आय है तो पत्नी भरण-पोषण की है हकदार

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: पति के पास पर्याप्त आय है तो पत्नी भरण-पोषण की है हकदार

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी भरण-पोषण मामले की याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी भरण-पोषण की हकदार है, भले ही उसके खिलाफ वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश पारित है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया और कहा कि पत्नी को भरण-पोषण देने के लिए सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कोई रोक नहीं है। मामले में न्यायमूर्ति बृज राज सिंह की खंडपीठ के अनुसार, इस आधार पर भरण-पोषण से इनकार करना बहुत कठोर होगा कि पति के पक्ष में वैवाहिक अधिकारों की बहाली का फरमान पारित किया गया है।

जाने पूरा मामला

दाखिल याचिका के अनुसार फैमिली कोर्ट, सुल्तानपुर द्वारा पारित भरण-पोषण आदेश के खिलाफ पत्नी द्वारा दायर एक पुनरीक्षण याचिका पर विचार करते हुए ये टिप्पणियां कीं है। इसी मामले में दोनों ने 2007 में शादी कर ली और आरोप है कि शादी के तुरंत बाद ही पति व ससुराल वालों ने दहेज के लिए पत्नी को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। इसके बाद अक्टूबर 2021 में उसके पति ने उसे छोड़ दिया और वह अपने माता-पिता के साथ रहने लगी। जब पत्नी ने गुजारा भत्ता की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया और कहा गया था कि उसके पति ने प्रति माह 30,000 रुपये कमाए, जबकि उसके पास आय का कोई स्रोत नहीं था।

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मामले में पति ने कहा कि 2007 में पत्नी का गर्भपात हो गया और पति के पक्ष में दांपत्य बहाली का फरमान भी दे दिया गया है। कोर्ट ने गुजारा भत्ता की मांग वाली पत्नी की अर्जी खारिज कर दी। दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को वैवाहिक अधिकारों की बहाली के बारे में जानकारी थी, लेकिन वह अदालत के सामने पेश नहीं हुई और इससे पता चलता है कि वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि पत्नी को भरण-पोषण से इनकार करना बहुत कठोर होगा क्योंकि वह कानूनी रूप से पति से विवाहित है और उसके पास आय का कोई स्रोत नहीं है। उच्च न्यायालय ने आक्षेपित आदेश को रद्द कर दिया और मामले को नीचे की अदालत में भेज दिया और यह तय करने के लिए कहा कि क्या पति ने पत्नी को छोड़ दिया, यदि पत्नी कमाती है, यदि पति के पास पर्याप्त आय है और यदि पत्नी भरण-पोषण की हकदार है।