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Allahabad High Court Orders: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली और कानून के गलत इस्तेमाल पर कड़ा रुख अपनाया है। हाई कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस द्वारा गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी करते हुए पिटीशनर अभिषेक त्यागी के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने पिटीशनर को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह राशि राज्य सरकार 1 महीने के भीतर अदा करेगी और सरकार चाहे तो इसे जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूल सकती है। अदालत ने साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम के तहत किसी भी तरह के अवैध और मनमाने आदेश देना अब अधिकारियों को भारी पड़ेगा।
यह पूरा मामला गाजियाबाद के थाना टीला मोड़ क्षेत्र का है। अभिषेक त्यागी के खिलाफ वर्ष 2022 और वर्ष 2025 में दो मुकदमे दर्ज किए गए थे जिसके आधार पर पुलिस ने उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम के तहत कार्रवाई शुरू कर दी थी। अपर पुलिस आयुक्त ने आदेश देकर अभिषेक को हर दूसरे और चौथे शनिवार को थाने में हाजिरी लगाने का निर्देश दिया था। मंडलायुक्त मेरठ द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।
हाई कोर्ट की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल एक या दो मुकदमों के आधार पर किसी को आदतन अपराधी मानकर गुंडा घोषित करना कानून का सरासर दुरुपयोग है। कोर्ट ने कहा कि अब ऐसे मनमाने आदेश देने वाले अधिकारियों को कड़ा संदेश देने का समय आ गया है ताकि नौकरशाही इस तरह के अवैध अधिकारों के प्रयोग को रोके। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को अपने अधिकारों का इस्तेमाल कानून के मुताबिक करना चाहिए।
सुलतानपुर से इलाज के लिए लखनऊ लाए गए एक नवजात की मौत के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश की चिकित्सा-व्यवस्था को लेकर भी गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर काटने से बचाने के लिए एक ठोस और समयबद्ध रोडमैप पेश किया जाए। मरीज को रेफर करते समय अस्पतालों के बीच बेहतर तालमेल होना जरूरी है। नए मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त सुविधाएं, विशेषज्ञ डॉक्टर और वेंटिलेटर जैसी जरूरी व्यवस्था होनी चाहिए। कोर्ट ने ऑनलाइन रेफरल व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया ताकि गंभीर मरीज को सीधे उचित अस्पताल भेजा जा सके और इलाज में कीमती समय बर्बाद न हो। इस मामले में अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होगी।
सोनभद्र की रजिया उर्फ दुलरिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि केवल धर्म परिवर्तन करने मात्र से कोई व्यक्ति स्वतः अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं खोता है। हालांकि यह देखना भी जरूरी है कि वह व्यक्ति जनजातीय रीति-रिवाजों, परंपराओं और अपने समाज से जुड़ा हुआ है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि संबंधित भूमि के लेनदेन के समय याची के पास अपनी जनजाति का आवश्यक दर्जा होने का निरंतर प्रमाण होना जरूरी है। सभी परिस्थितियों को परखने के बाद कोर्ट ने दुद्धी के डिप्टी कलेक्टर के आदेश को बरकरार रखा।
लखनऊ के विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर चल रहे फर्जी साइबर कॉल सेंटर के मामले में हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने वहां से पकड़े गए 119 लोगों की गिरफ्तारी को पूरी तरह वैध करार दिया है। पुलिस ने छापे के दौरान भारी मात्रा में लैपटॉप, मोबाइल और अन्य उपकरण बरामद किए थे। आरोप था कि कॉल सेंटर के जरिए अमेरिकी नागरिकों को सरकारी एजेंसी और कंपनियों का अधिकारी बनकर ठगा जाता था। कोर्ट ने कहा कि प्रक्रियागत मामूली कमियों से पूरी गिरफ्तारी अवैध नहीं हो जाती।
वाराणसी के शिक्षक उमाकांत प्रसाद शर्मा समेत 4 लोगों से दिव्यांग यात्रा भत्ता वसूलने के BSA के आदेश को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। कोर्ट ने मामला जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को वापस भेजते हुए सभी पक्षों को सुनने के बाद नया आदेश जारी करने को कहा है। BSA ने जून 2022 से दिए गए दिव्यांग यात्रा भत्ते की वसूली का आदेश दिया था। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दो महीने के भीतर नियमों के अनुसार कारण सहित नया आदेश जारी किया जाए.
एक अन्य मामले में हाई कोर्ट ने दहेज हत्या के 15 साल पुराने मुकदमे में 2 साल से जेल में बंद एक अभियुक्त को जमानत दे दी। अजेंद्र 9 नवंबर, 2024 से जेल में था। कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि अभियुक्त के खिलाफ आरोप तय करने में ही 1 साल 9 महीने का समय लग गया। रिपोर्ट के मुताबिक 21 दिसंबर, 2024 को आरोप तय किए गए थे, लेकिन 21 जुलाई, 2026 तक किसी गवाह की गवाही नहीं हुई थी। अदालत ने इसे अभियोजन पक्ष की गंभीर लापरवाही माना जिसके चलते निर्दोष को बिना सजा के जेल में रहना पड़ा।
Updated on:
16 Sep 2026, 5:52 PM IST
Published on:
16 Sep 2026, 5:52 PM IST
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