
बाहर नहीं निकल पा रहा सरिस्का का इको सेंसेटिव जोन
दो साल से ज्यादा समय से आपत्तियों के बीच झूल रहा, नहीं हो सका अंतिम प्रकाशन
अलवर. सरकार के लचर सिस्टम का अंदाजा सरिस्का टाइगर रिजर्व के ईको सेंसेटिव जोन की प्रक्रिया से सहज लगाया जा सकता है। दो साल से ज्यादा समय तो इसके प्रारूप पर आमजन से आपत्ति मांगने में निकल गए, वहीं इनके निस्तारण के बाद यह प्रस्ताव सरकारी फाइलों से बाहर कब निकल पाएगा, इसका भी अंदाजा लगाना मुश्किल है।
सरिस्का टाइगर रिजर्व का इको सेंसेटिव जोन के प्रारूप का अंतिम प्रकाशन किया जाना है। अभी यह प्रस्ताव अभी राज्य सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधीन प्रक्रियाधीन है। इससे पूर्व इको सेंसेटिव जोन का प्रस्ताव एक साल से ज्यादा समय तक राज्य सरकार के पास रह चुका।
मियाद निकली तो प्रस्ताव हुआ अमान्य
इको सेंसेटिव जोन के सम्बन्ध में प्रावधान है कि यदि प्रस्ताव 725 दिन में अंतिम प्रकाशन नहीं हो पाता है तो वह प्रस्ताव अमान्य हो जाता है। पूर्व में तैयार किए गए सरिस्का के इको सेंसेटिव जोन के प्रस्ताव का 725 दिन में अंतिम प्रकाशन नहीं हो पाया। पूर्व में यह प्रस्ताव राज्य सरकार के समक्ष लंबे समय तक विचाराधीन रहा। इस पर आमजन की आपत्ति भी मांगी गई और बाद में टिप्पणी के साथ केन्द्र सरकार को भेजा गया, लेकिन इस प्रक्रिया में अनिवार्य 725 दिन की अवधि पूरी हो गई, इस कारण प्रस्ताव को अमान्य कर नए सिरे से सरिस्का के इको सेंसेटिव जोन का प्रस्ताव तैयार कर गत 2 नवम्बर को प्रारूप प्रकाशन के बाद 60 दिन में आमजन से आपत्ति मांगी गई। यह अवधि भी पूरी हो चुकी है। अब राज्य सरकार अपनी टिप्पणी के साथ इस प्रस्ताव को फिर केन्द्र सरकार के समक्ष भेजेगी, जिसके बाद ही केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय सरिस्का के इको सेंसेटिव जोन की अंतिम अधिसूचना जारी हो सकेगी।
अधिसूचना में देरी से जिले को यह नुकसान
सरिस्का टाइगर रिजर्व के इको सेंसेटिव जोन की अंतिम अधिसूचना में देरी से अलवर जिले को सबसे बड़ा नुकसान रोजगार एवं राजस्व का हो रहा है। इस प्रस्ताव की देरी का सबसे बड़ा प्रभाव खनन क्षेत्र एवं मिनरल उद्योगों पर पड़ रहा है। वहीं सरिस्का की भूमि पर अतिक्रमण, ग्रामीणों से जमीनी विवाद के साथ ही होटल व्यवसाय भी रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा है।
Updated on:
07 Jan 2024 07:04 pm
Published on:
07 Jan 2024 06:58 pm
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