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16 साल की नाबालिग को छत्तीसगढ़ से दिल्ली लाई महिला एजेंट, फिर अलवर भेजा

छत्तीसगढ़ की रहने वाली एक नाबालिग को पहले दिल्ली लाया गया और फिर अलवर भेज दिया गया। यहां उससे एक परिवार ने

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छत्तीसगढ़ की रहने वाली एक नाबालिग को पहले दिल्ली लाया गया और फिर अलवर भेज दिया गया। यहां उससे एक परिवार ने महीनेभर तक घरेलू काम कराया। जब मजदूरी मांगी तो उसे ताने दिए गए। साथ ही यह कहा गया कि पैसा उस एजेंट या ठेकेदार को मिलेगा, जिसने तुम्हें यहां भेजा था।

मौका देख यह नाबालिग वहां से भाग निकली और चाइल्ड लाइन की मदद से बालिका गृह पहुंच गई। यह किशोरी अलवर शहर के रास्ते भी नहीं जानती। यह बताना भी मुश्किल हो रहा है कि अलवर में वह कहां रह रही थी। वह केवल इतना बता पा रही है कि घर बहुत बड़ा था। घर में दो बुजुर्ग सदस्यों को मिलाकर 5-6 लोग रह रहे थे। इस किशोरी की उम्र करीब 16 साल है।

परिवार के पास भेजने में हो रही देरी

इस किशोरी को बालिका गृह में आए 10 दिन से ज्यादा हो गए। अभी तक इसे माता-पिता के पास नहीं भेजा गया। श्रम निरीक्षक ने किशोरी के बयान भी दर्ज कर लिए हैं। बाल कल्याण समिति ने भी किशोरी को घर पहुंचाने के लिए दो बार पत्र लिखा, लेकिन न तो माता-पिता को बुलाया गया और न ही किशोरी को उसके घर भेजा गया है। इस तरह के मामले में किशोरी को पुलिस कस्टडी में उसके घर भेजा जाता है।

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बालश्रम के लिए लाई जाती हैं

पछले 5 साल में एक दर्जन से ज्यादा बालिकाएं बालश्रम करते हुए पाई गई। ज्यादातर बालिकाएं उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ असम आदि राज्यों से अलवर पहुंची। इनकी उम्र 13 से 16 साल के बीच थी। इनको कारखानों व घरों से मुक्त कराया गया । कुछ बालिकाएं खुद पुलिस के पास मदद मांगने पहुंच गई। भिवाड़ी फेज 3 से करीब 6 बालिकाएं पुलिस लेकर आई थी। इनमें से ज्यादातर को उनके घर पहुंचाया जा चुका है।

उसके जैसी 5-6 बालिकाएं और भी

मैं गरीब परिवार से हूं। पिता की आंखें खराब हैं। मां मजदूरी करती है। मेरी पढ़ाई छूट गई। पेट भरना मुश्किल हो रहा था। तभी पास के गांव में रहने वाली एक दीदी उसे काम दिलाने के बहाने दिल्ली ले गई। यहां उसके जैसी 5-6 बालिकाएं और भी थीं। कुछ समय तक दिल्ली के एक घर में काम किया। फिर ठेकेदार ने अलवर के एक परिवार में काम करने भेज दिया। यहां मैंने एक माह से ज्यादा समय तक काम किया। घर में मुझ पर नजर रखी जाती थी। बाहर निकलना मुश्किल हो रहा था। एक दिन सुबह दरवाजा खुला देख वहां से भाग निकली। मेरे लिए यह शहर अनजान है। कोई जगह नहीं मिली तो सड़क किनारे बैठ हुई थी, तब किसी ने चाइल्ड लाइन का नंबर दिया और फोन कर सारी बात बताई। वहां से टीम आई और मुझे बालिका गृह में भेज दिया। - जैसा किशोरी ने पत्रिका रिपोर्टर को बताया

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