
पत्रिका फाइल फोटो
अलवर जिले में मानसून का प्रवेश हो चुका है, लेकिन बिन बारिश के दिन लोगों के लिए असहनीय हो रहे हैं। तापमान कम होने के बावजूद उमस लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कई शहरों में पड़ने वाली 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक की लू का जिक्र होता है। हालांकि अब वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के बीच एक नई और गंभीर चेतावनी दी है। यह खतरा सिर्फ बढ़ते तापमान का नहीं, बल्कि उमस भरी गर्मी का है, जो शरीर पर कहीं अधिक असर डालती है। मुंबई जैसे तटीय शहरों से निकलकर अब यह स्थिति दिल्ली समेत उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों तक पहुंच चुकी है। यही वजह है कि शनिवार को अधिकतम तापमान 37 डिग्री से. था, लेकिन लोगों को 45 डिग्री की लू से भी ज्यादा तेज गर्मी महसूस हुई।
जलवायु परिवर्तन पर शोध करने वाले वैज्ञानिक संस्थान क्लाइमेट सेंट्रल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत के तटीय शहरों के बाद अब मैदानी क्षेत्रों में भी ‘वेट बल्ब’ तापमान का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती गर्मी और हवा में नमी का स्तर मिलकर इंसानी शरीर के लिए अधिक खतरनाक परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं। हीट इंडेक्स का आकलन करते समय तापमान के साथ हवा में मौजूद नमी को भी शामिल किया जाता है। इसी कारण वास्तविक तापमान से कहीं अधिक गर्मी महसूस होती है।
वेट बल्ब का तापमान सामान्य तापमान से अलग होता है। इसमें हवा की नमी को भी मापा जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक 25 डिग्री सेल्सियस का वेट बल्ब तापमान भी हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थितियों का जोखिम बढ़ा सकता है। जब तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है और हवा में नमी बढ़ जाती है, तब यह स्थिति 45 डिग्री की शुष्क लू से भी अधिक खतरनाक हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में शरीर से लगातार पसीना निकलता रहता है, लेकिन हवा में अधिक नमी होने के कारण पसीना जल्दी नहीं सूखता। इससे शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और आंतरिक तापमान लगातार बढ़ने लगता है, जिससे हीट स्ट्रोक और अन्य स्वास्थ्य संबंधी जोखिम काफी बढ़ जाते हैं।
Updated on:
05 Jul 2026 12:07 pm
Published on:
05 Jul 2026 12:06 pm
