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अलवर से एक कविता रोज: या धरती राजस्थान री’ लेखक-सुन्दर लाल मेहरानिया अलवर

या धरती राजस्थान री,करता इसपे अभिमान री।लगे स्वर्ग सी सुन्दर ये न्योछावर करदूँ जान री।या धरती राजस्थान री,करता इसपे अभिमान री।

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अलवर

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Lubhavan Joshi

Sep 15, 2020

Alwar Se Ek Kavita Roj: Ya Dharti Rajasthan Ri

अलवर से एक कविता रोज: या धरती राजस्थान री' लेखक-सुन्दर लाल मेहरानिया अलवर

या धरती राजस्थान री,
करता इसपे अभिमान री।
लगे स्वर्ग सी सुन्दर ये
न्योछावर करदूँ जान री।
या धरती राजस्थान री,
करता इसपे अभिमान री।

पन्ना का कलेजा फट जाये,
बैरी की खडग जब चल जाये,

बेट का लहू फिर फर बह जाये,

लग जाये-बाज़ी जान री।
या धरती राजस्थान री
करता इसपे अभिमान री।

एक नार हुई क्षत्राणी थी
सिर काट के दी सेनाणी
चुन्डा की जान बचाणी थी
प्रिय की बच जाये जान री
या धरती राजस्थान री,
करता इसपे अभिमान री।

पद्यमिनी की अजब कहाणी थी
खिलजी की नीत डिगाणी थी
जौहर की आग पिछाणी थी
घट जाये ना कोई मान री,
या धरती राजस्थान री,
करता इसपे अभिमान री।

मीरा गिरिधर की दासी थी
दर्शन की बहुत वो प्यासी थी
राणा के गले की फाँसी थी
रजपूती मिट जाये आन री,
या धरती राजस्थान री,
करता इसपे अभिमान री।

प्रताप सा कोई वीर नहीं
दुश्मन की उठे शमशीर नहीं
जो बाँध सके जंजीर नहीं
गाथा-मेवाड़ी शान री,

या धरती राजथान री,
करता इसपे अभिमान री
लगे स्वर्ग से भी सुन्दर
न्योछावर करदूँ जान री
या धरती राजथान री,
करता इसपे अभिमान री।

लेखक-सुन्दर लाल मेहरानिया अलवर