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अलवर : कहां थम गया वो शोर, अब केवल यादें बनकर रह गए हैं शहर के पुराने सभी थियेटर व सिनेमाघर

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अलवर

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Prem Pathak

Aug 10, 2018

Alwar Theatres and cinemas now become memories for alwar people

अलवर : कहां थम गया वो शोर, अब केवल यादें बनकर रह गए हैं शहर के पुराने सभी थियेटर व सिनेमाघर

नए दौर में। इसकी तेज रफ्तार कई बार मुझे थका देती है, तो मन करता है कि अपने पुराने दौर में चला जाऊं। दोस्तों के साथ सिनेमा और थियेटर देखूं, लेकिन मन मसोस कर रह जाता हूं। फिर खुद को अकेला सा महसूस करते हुए टीवी या मोबाइल देखने लगता हूं, लेकिन वो सुकून और रोमांच नहीं मिल पता, जो कभी सिनेमाघर और थियेटर में मिलता था। मेरी युवा पीढ़ी ने इस सिनेमाई दौर को इतिहास के पन्नों पर ही पढ़ सकती है, क्योंकि आज न तो अलवर मे वो थियेटर बचे और न सिनेमाघर।

मुझे आज भी याद है जब न्यूतेज, अशोका, गोपाल और भारत टाकीज में कोई नई फिल्म लगती थी, तो लोग कैसे टूट पड़ते थे। फिल्म शुरू होने के कई घंटों पहले ही टिकट विंडो के बाहर लम्बी कतार लग जाती थी। लोग धक्का-मुक्की कर लाइन में आगे घुसकर खिडक़ी तक पहुंचने का प्रयास करते थे। टिकट के लिए युवाओं की टोली झगड़ा-फसाद और बेल्ट चलाने से भी नहीं चूकती थी। बड़े बैनर की फिल्मों का शायद ही ऐसा कोई शो होता था, जो हाउसफुल नहीं रहता था। वहीं, थियेटर में होने वाले नाटक व ड्रामे देखने को भी लोग लालायित रहते थे। सिनेमाघरों में फिल्म लगने से पहले शहरभर में रिक्शा घुमाकर माइक से प्रचार कराया जाता था।

शुक्रवार का रहता था बेसब्री से इंतजार

सिनेमाघरों में शुक्रवार को नई फिल्म लगती थी। इसलिए लोगों को शुक्रवार को बेसब्री से इंतजार रहता था। वहीं, युवाओं में इस बात की भी होड़ रहती थी कि फिल्म को ‘फस्र्ट डे- फस्र्ट शो’ देखना है। आसपास गांवों और जिलों के लोग भी अलवर में सिनेमाघरों में फिल्म देखने आते थे। इसके अलावा लोगों किसी नए शहरमें जाते थे तो वहां के सिनेमाघर में फिल्म जरूर देखते थे।

ब्लैक में खरीदनी पड़ती थी टिकट

जो लोग परिवार सहित फिल्म देखने जाते थे उन्हें टिकट के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। वह लोग या तो टिकट के लिए एडवांस बुकिंग कराते थे, या फिर टिकट विंडो के बाहर ब्लैक करने वाले लोगों से टिकट ज्यादा रेट में खरीदते थे।

दिल्ली, गुडगांव भी जाते थेे

छोटे शहरों के सिनेमाघरों में फिल्म रिलीज होने के कई माह बाद तक आती थी। ऐसे में अलवर के लोग दिल्ली और गुडगांव भी फिल्म देखने के लिए जाते थे। पुराने रंगकर्मी बताते हैं कि सभी फिल्में दिल्ली में रिलीज होती थी, लेकिन बॉबी फिल्म गुडग़ांव में रिलीज हुई तो अलवर के लोग वहां फिल्म देखने पहुंच गए।

मालन की गली में था पहला सिनेमाघर

इप्टा के प्रदेशाध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी जगदीश शर्मा बताते हैं कि अलवर में पहला सिनेमाघर मालन की गली में गटरु-मटरु मंदिर के पास था। जिसमें 50 के दशक के आसपास पहली मूक फिल्म लगी, जो खूब चली। इसके बाद न्यूतेज टाकीज, फिर अशोका, गोपाल और भारत टाकीज खुले। न्यूतेज पहले रंगमंच था, जिसमें ड्रामे होते थे। बाद में ये टाकीज बना। अशोका टाकीज में पहली फिल्म 1965-66 में गोकुल का चोर लगी। 70 के दशक से पहले सिनेमाघरों में थर्ड क्लास की टिकट 40 पैसे, सैकेण्ड क्लास 60 पैसे, बालकनी 1.20 रुपए और बॉक्स 2 रुपए की होती थी।

नाट्य परम्परा पुरानी

वरिष्ठ रंगकर्मी गिरिराज जैमिनी बताते हैं कि अलवर की नाट्य परम्परा 1912-13 में प्रारम्भ होना पाया जाता है। पूर्व नरेश महाराज जयसिंह के शासनकाल में हरिकीर्तन समाज और अभिनय समाज नाटक किया करते थे। महाराजा जयसिंह ने दोनों समाजों को एक किया और राजर्षि अभय समाज का नाम दिया। जिसमें पं. नंदकिशोर मिश्र द्वारा निर्देशित नाटक ‘परीक्षित’ जहां म्यूजियम है वहां पर खेला गया। 60 के दशक में अभय समाज द्वारा रामलीला का मंचन शुरू हुआ तथा पुरुषार्थी समाज द्वारा अलग रंगमंच पर रामलीला का मंचन हुआ। 1958 में श्यामलाल सक्सेना और गिरिराज जैमिनी के निर्देशन में पारसी एवं आधुनिक नाटकों का दौर शुरू हुआ और महाराजा भर्तृहरि नाटक मील का पत्थर बन गया।