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अस्पताल में ‘कागजी राहत’, बेड होते हुए भी मरीजों को नहीं मिल रहे

गर्मी की दस्तक के साथ ही जिला अस्पताल की व्यवस्थाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं। हालात ऐसे हैं कि मरीजों को इलाज से पहले बेड के लिए जंग लड़नी पड़ रही है।

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अलवर

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Umesh Sharma

Apr 20, 2026

गर्मी की दस्तक के साथ ही जिला अस्पताल की व्यवस्थाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं। हालात ऐसे हैं कि मरीजों को इलाज से पहले बेड के लिए जंग लड़नी पड़ रही है। अस्पताल प्रशासन के पास बेड हैं, लेकिन मरीजों को नहीं मिल पा रहे।
तापमान बढ़ने के साथ मरीजों की संख्या में करीब 15 प्रतिशत तक इजाफा हुआ है। 17 अप्रेल को दोपहर में सामान्य अस्पताल में 278 मरीज भर्ती थे, जिनमें 127 नए मरीज शामिल थे। रविवार शाम 4 बजे तक यह संख्या बढ़कर करीब 332 पहुंच गई। कागजों में 41 बेड खाली बताए गए, लेकिन ये सभी ऐसे वार्डों में हैं जहां सामान्य मरीजों को भर्ती नहीं किया जाता। नतीजा शाम होते-होते परिजन और स्टाफ बेड के लिए एक वार्ड से दूसरे वार्ड में भटकते नजर आते हैं। चिकित्सकों के अनुसार इन दिनों वायरल बुखार, उल्टी-दस्त और पेट दर्द के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे दबाव और ज्यादा बढ़ गया है।
कागजों में बढ़े बेड, हकीकत में घटती सुविधा
जिला अस्पताल में पहले 587 बेड स्वीकृत थे, जबकि करीब 850 बेड तक लगाए गए थे। लेकिन मरम्मत कार्य के चलते कई वार्डों से बेड हटा दिए गए। फिलहाल सामान्य अस्पताल में करीब 373 और जनाना व शिशु अस्पताल में करीब 350 बेड की सुविधा ही उपलब्ध है। चौंकाने वाली बात यह है कि हाल ही में सरकार ने बजट रिप्लाई में 750 बेड स्वीकृत होने का दावा किया, जबकि इससे अधिक बेड पहले ही अस्पताल में लगाए जा चुके थे। ऐसे में यह घोषणा महज कागजी साबित होती नजर आ रही है।
जनरल वार्ड फुल, मरीज बेहाल
वर्तमान में सामान्य अस्पताल के विभिन्न वार्डों में बेड तो लगे हैं, लेकिन जनरल वार्डों में मरीजों के लिए सिर्फ 204 बेड ही उपलब्ध हैं। यही कारण है कि मरीजों और उनके परिजनों को एक वार्ड से दूसरे वार्ड तक चक्कर काटने पड़ रहे हैं। शिशु अस्पताल में भी स्थिति चिंताजनक है। पहले जहां 70-80 बेड की सुविधा थी, वहीं 20 बेड का वार्ड बंद होने के बाद संख्या और घट गई। फिलहाल यहां सामान्य वार्ड में 22, एनसीयू में 20, एमएनसीयू में 20, ई टैट वार्ड में 10 और पीआईसीयू में सिर्फ 7 बेड ही उपलब्ध हैं। कागजों में बढ़ते बेड और घोषणाओं के बीच मरीजों की जमीनी परेशानी साफ दिख रही है। सवाल यही है-जब बेड हैं, तो मरीजों को क्यों नहीं मिल रहे?