गदा के प्रहार से भीम ने बनाई थी पोल, तब पड़ा नाम ‘पाण्डुपोल’

बूढ़े वानर का रूप बनाकर बजरंगबली ने तोड़ा था भीम का अहंकार
अलवर सहित दूर दराज राज्यों से आते पाण्डुपोल हनुमानजी के दर्शन करने लोग

By: Pradeep

Published: 14 Sep 2021, 02:13 AM IST

अलवर/नारायणपुर. पाण्डुपोल का पौराणिक महत्व को देखते हंै तो सालभर श्रद्धालु यहां सीधे आते जाते रहते हैं। यहां कि अबोहवा लोगों को खूब भाती है और अरावली पहाडिय़ों की कंदराअें के बीच पाण्डुपोल हनुमानजी का मंदिर बना हुआ है। किवदंती है कि यह स्थान महाभारत काल से जुड़ा हुआ है तथा लोकमान्यता है कि पाण्डुओं के वनवास के दौरान जब एक दिन भीम जंगल से गुजर रहे थे तो रास्ते में एक बुजुर्ग वानर अपनी पूंछ को रास्ते में फैलाए सोता हुआ मिला। भीम में अपनी शक्ति व बलशाली होने का अहंकार था। भीम ने अहंकारवंश वानर को जगाया और अहंकार भरे शब्दों से बुजुर्ग वानर से रास्ते से पूछ हटाने को कहा। साधारण वानर जानकर भीम ने उसे धमकाया। तब वानर ने अपनी बुजुर्ग अवस्था का हवाला देकर भीम से कहा कि वह खुद ही पूछ को हटाकर दूसरी जगह रख दें। भीम ने बुजुर्ग वानर पूछ को हटाने के लिए उसे उठाना चाहा तो वह काफी भारी जान पड़ी। भीम पूरी ताकत लगाने के बावजूद पूछ को उठाना तो दूर उसको हिला तक नहीं पाए। तब जाकर भीम को आभास हुआ कि बुजुर्ग वानर साधारण वानर नहीं है। तब सारा माजरा समझ कर भीम ने बुजुर्ग वानर को नमन किया और अपने वास्तविक रूप में आने का आग्रह किया। कहा जाता है कि वानर रूप से साक्षात हनुमानजी ने भीम का मार्ग रोका था। ताकि भीम का अहंकार तोड़ा जा सके। हनुमानजी के दर्शन देने के बाद भीम को अपनी गलती का अहसास हुआ। बाद में इसी स्थल पर बनी शिला प्राकृतिक रूप में हनुमानजी की लेटी प्रतिमा के रूप में पूजी जाने लगी। बाद में वहां मंदिर भी बना जहां हर साल मेला भी भरता है।


भीम ने पहाड़ को तोडकऱ बनाया था रास्ता
किवदंती है कि महाभारत काल में जब पाण्डव कौरवों से जुए में अपना सबकुछ हार गए तब उन्हें उनकी शर्त के मुताबिक 13 वर्ष के लिए हस्तिनापुर छोडऩा पड़ेगा। पाण्डवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास था। अज्ञातवास के दौरान पाण्डवों ने तत्कालीन मत्स्य देश के जंगलों को ही चुना। यहां के घने वन और कंदराओं में रहकर पाण्डव समय व्यतीत कर रहे थे। यहां पानी, फल आदि प्रचुर मात्रा के कारण उन्होंने यह जगह चुनी। कौरवों को जब पाण्डु पुत्रों के मत्स्य देश के जंगलों में छुपे होने की जानकारी मिली तो उन्होंने पाण्डवों का अज्ञातवास भंग करने के लिए जंगल की घेराबंदी शुरू कर दी। सरिस्का की घाटी व दर्रो में प्रवेश कर कौरव उनके करीब आ रहे हैं तो उन्होंने यहां से निकलने का निर्णय किया लेकिन पांडव जिस रास्ते से निकलने लगे उन्हें उस रास्ते पर कौरवों की मौजूदगी का पता चल गया था। अब पाण्डवों के सामने सिर्फ एक मार्ग सुरक्षित था जिस पर विशाल अरावली पर्वत सीना ताने उनके मार्ग में बाधा बना खड़ा था। लेकिन कोई विकल्प पाण्डवों के सामने नहीं सूझने पर युद्धिष्ठर ने भीम को आदेश दिया कि तुम अपनी गदा से शीघ्र अपनी विशाल कठोर गदा से इस पहाड़ के कंठ स्थल पर प्रहार कर रास्ते की निर्माण करो, जिससे हम कौरवों द्वारा पकड़े नहीं जा सकें। भीम ने आदेश का पालन कर बिना देरी लिए पहाड़ पर अपनी गदा से प्रहार किया और पहाड़ से सुरंग का निर्माण कर दिया। उसी सुरंग से होकर पाण्डव पाण्डुपोल से द्रोपदी के साथ आगे बढ़ते चले गए। इसके बाद उन्होंने अपने छिपने के भावी लक्ष्य को निर्धारित कर मत्स्य देश के राज विराट नगरी में भेष बदलकर अज्ञातवास का बाकी समय बिताया। महाभारत काल में भीम की गदा से प्रहार से बनी सुरंग आज भी मौजूद है। इसे पाण्डुपोल के नाम से जाना जाता है। लेकिन पोल तक जाने वाला रास्ता जर्जर होने के कारण बारिश के दौरान पानी का तेज बहाव क्षेत्र होने के बचने की जगह नहीं होने से हादसे हो चुके हैं। मेले के दौरान पोल पर जाने के लिए प्रतिबंध लगा दिया जाता है। अबकी बार कोरोना वैश्विक महामारी के कारण हनुमानजी व भर्तृहरि बाबा के दर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

Pradeep Desk
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