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ना डिग्री.. ना डिप्लोमा, लेकिन कला ऐसी कि हम-आप पलभर में मुरीद हो जाएं

चित्रकार हनुमंत सिंह किशनगढ़ शैली, कांगडा शैली, बूंदी शैली सहित अन्य कई प्रकार की शैली के चित्र बनाते हैं। ये अद्भुत कला के धनी हैं। इस कला के कुछ ही कलाकार शहर में हैं। हनुमंत सिंह ने इस कला के लिए कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है और ना ही कोई डिग्री या डिप्लोमा किया है।    

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अलवर

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Suman Saurabh

Feb 16, 2024

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अलवर। शहर में कलाकारों की कमी नहीं है। यहां एक से बढ़कर एक बेहतरीन कलाकार हैं, जो अपनी कला को बहुत ही शिद्दत के साथ अंजाम दे रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं हनुमंत सिंह। देश के कई राज्यों में अपनी कला के जरिए लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। कला को जिंदा रखने वाले ये कलाकार लगातार कुछ नया कर रहे हैं। उन्हें बचपन से ही चित्रकारी का शौक है। ये किशनगढ़ शैली, कांगडा शैली, बूंदी शैली सहित अन्य कई प्रकार की शैली के चित्र बनाते हैं। ये अद्भुत कला के धनी हैं। इस कला के कुछ ही कलाकार शहर में हैं।

अलवर शहर में वन विभाग की दीवारें हों या फिर पुलिस अन्वेषण भवन सहित अन्य दीवारें इनकी बनाई पेंटिंग हर जगह देखने को मिल जाएगी, जो लोगों को बहुत पसंद आती है। काम के बदले मेहनताना कम है। गुजारा हो रहा है, लेकिन इस कला को वह ऊंचाइयों तक पहुंचाने में लगे हैं। इनकी बनाई पेंटिंग व पॉट तैयार कर बाजार में बेचे जा रहे हैं ताकि सही दाम मिल सके।

जैन मंदिरों में की है सोने की चित्रकारी

हनुमंत सिंह ने इस कला के लिए कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है और ना ही कोई डिग्री या डिप्लोमा किया है लेकिन ये जो बनाते हैं तो अपनी पहचान जरूर छोड़ते हैं। तिजारा का जैन मंदिर हो या फिर शहर के जैन मंदिर इन मंदिरों में की चित्रकारी व सोने की पेंटिंग का काम पर्यटकों को बहुत आकर्षित कर रहा है।

ये है थोड़ी पीड़ा

हनुमंत बताते हैं कि काम के बदले मजदूरी इतनी कम मिलती है कि घर तक नहीं बनवा पाए। इस पर सरकार भी ध्यान दे और जिला प्रशासन भी, तो इस कला में और भी कलाकार आजीविका कमा सकते हैं। वह कहते हैं कि बाजार में उनकी पेंटिंग किए गए पॉट हजारों में बिकते हैं लेकिन उनका मेहनताना कुछ कम है।