
पर्यावरण और पेड़-पौधों का दुश्मन ‘विलायती बबूल’
प्रदीप यादव
अलवर. काम का न काज का दुश्मन अनाज का, वैसे यह कहावत खाली लोगों के लिए कही जाती रही है, लेकिन अलवर सहित प्रदेश को हरा भरा करने के दौर में एक हरा पौधा एेसा भी है जो कि खुद जीवित रहने के लिए आसपास की लाभकारी व औषधीय वनस्पति को भी निगल रहा है। यह हरा पौधा है विलायती बबूल (कीकर)। इसका जिले में बढ़ता दायरा अन्य वनस्पति के लिए संकटकारी बन गया है। यह पौधा कटीला होने से पशु-पक्षियों को ही नहीं, पर्यावरण के लिए भी खतरा बन गया है।
लगभग तीन दशक पहले अरावली पर्वत शृंखला को हरा-भरा करने के लिए हेलीकॉफ्टर से विलायती बबूल (कीकर) के बीज बिखेरे गए थे। इन विलायती बबूल के पेड़ों से अरावली पर्वतमाला कम हरी हो पाई, लेकिन जिले के खेत, क्यार, जंगल से होते हुए अब यह सरिस्का बाघ परियोजना तक जड़ जमा चुकी है। विलायती बबूल को यहां जमीन इतरी रास आई कि इसके सामने अन्य दूसरी प्रजातियों के पौधों का अस्तित्व संकट में आ गया। इसके कटीले पौधों का दुष्प्रभाव अब जनजीवन पर भी पडऩे लगा है। ये कटीले पौधे जीव-जंतु व पक्षी के लिए घातक होने के साथ ही पर्यावरण को भी निगल रहा है। सरकारी स्तर पर विलायती बबूल को हटाने का काम शुरू तो हुआ लेकिन कीकर के पेड़ों के बढ़ते क्षेत्रफल के आगे निष्फल ही साबित हुआ है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रोफेसर और पूर्व प्रो-वाइस चांसलर सी आर बाबू ने लंबे समय से विलायती बबूल के पर्यावरण और जैवविविधता पर दुष्प्रभाव का अध्ययन किया है। उन्होंने अपने रिसर्च में कहा कि विलायती बबूल भारत में आने के बाद अब तक देशी पेड़-पौधों की 500 प्रजातियों को खत्म कर चुका है।
फैक्ट फाइल
-12 मीटर तक होती है ऊंचाई
-10 सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं फलियां
-30 तक होती है फलियों में बीजों की संख्या
-10 साल उगने योग्य होता है इसका बीज
लाभकारी वनस्पति के लिए बना संकट
विलायती बबूल के पौधों के आसपास ढाक, धोक, कैर, सालर, खैरी, रोंझ के अलावा औषधीय पौधे गुग्गल, बांसा, चिरमी, ग्वार पाठा, सफेद आक, माल कांगनी, सफेद मूसली, मरोड़ फली, शतावर, गोखरू, जंगली प्याज, जटरोफा, अश्वगंधा व इंद्र जैसी कई वनस्पतियों के लिए संकट बन गया है।
पशु पक्षियों को भी खतरा
विलायती बबूल में कांटे होने के कारण यह पशु पक्षियों के लिए नुकसानदेह रहता है। पशु हरा चारे की आस में इन कटीले पौधों में फंस जख्मी होने के साथ ही पक्षी भी कांटों में फंसकर घायल हो जाते है।
वन विभाग ने कटीले पौधे हटाने की शुरू की मुहिम
अलवर जिले में वन विभाग ने विलायती बबूल के पौधे हटाने की प्रक्रिया शुरू कर करीब 160 हेक्टेयर जमीन से विलायती बबूल के पेड़ हटाए, लेकिन सरकारी स्तर पर किए गए ये प्रयास कीकर के तेजी से बढ़ते दायरे के आगे नाकाफी रहे हैं। वन विभाग ने अलग-अलग योजनाओं के तहत राज्य योजना के तहत नाबार्ड, कैंपा, कैंपा डीएफएल जैसी अनेकों योजनाओं में विलायती बबूल के पेड़ों को हटाने की शुरुआत की।
आसपास क्षेत्र में नहीं रहता कोई पेड़
कीकर के नीचे कोई पेड़ तो होना अलग बात है,लेकिन उसके नीचे घास भी नहीं उगती है। इससे पर्यावरण को भी नुकसान होता है। अरावली के आसपास के रहने वाले किसान कहते हैं कि पहले वो अपने पशुओं को पहाड़ में चरने के लिए छोड़ देते थे। उनके पशु वहां घास चरकर पल जाते थे। जब से कीकर के पेड़ लगाए हैं, पहाड़ों में घास भी नष्ट हो गई है। इसके नीचे दूसरे पेड़ भी खत्म हो गए है।
बबूल के कारण सडक़ें हो रही संकरी
विलायती बबूल के सडक़ किनारे लगने से इसकी झाडिय़ां सडक़ को घेर लेती हैं। इन झाडिय़ों के कारण कई बार सडक़ पर घुमाव पर सामने से आना वाला वाहन दिखाई नहीं देता जिससे दुर्घटना की संभवना बनी रहती है।
क्या है विलायती बबूल का इतिहास
वन विभाग ने अंग्रेजों के जमाने में भारत आए इजराइली बबूल की पौध को अरावली परियोजना में शामिल किया था। अरावली में आज इन्हीं पौधे बनी कंटीली झाडिय़ों की भरमार है। पहले राजस्थान में कुछ स्थानों पर इसका सीमित उपयोग था, लेकिन वर्ष 1999 में जब यूरोपियन देशों की मदद से अरावली परियोजना शुरू की तब राजस्थान से लाकर इजराइली बबूल के पौधे को इंट्रोड्यूस किया गया। यहां गांव-देहात में इसे विलायती कीकर भी कहा जाता है।
अरावली पर्वतमाला पर एक नजर
अरावली पर्वतमाला प्राचीनतम पर्वतमाला है। इसका अधिकांश भाग राजस्थान में है। अरावली का सर्वोच्च पर्वत शिखर राजस्थान में माउंट आबू के पास गुरुशिखर (1722 /1727 मी.) है। राष्ट्रपति भवन भी अरावली के क्षेत्र में बसा हुआ है। अवैध खनन के कारण अरावली नंगी हो गई थी। बाद में यूरोपियन देशों की मदद से तापमान को संतुलित रखने का ध्येय लेकर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समय पर पौधरोपण हुआ।
बबूल को हटाने में लगता है तीन साल का समय
वन विभाग अधिकारियों का कहना है कि वन विभाग की ओर से अब तक करीब 159 हेक्टेयर जमीन से विलायती बबूल हटाया गया है। विलायती बबूल को हटाने में करीब 3 साल का समय लगता है। इसकी मॉनिटरिंग की जाती है। विलायती बबूल को हटाने की मुहिम अलवर जिले में शुरू की गई है, जिसके तहत वन विभाग विलायती बबूल के पेड़ों को हटाने का काम कर रहा है और आगे भी यह प्रक्रिया जारी रहेगी।
Published on:
20 Oct 2021 01:58 am
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