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डंडे वाले से तोप वाले तक, अलवर के हनुमान मंदिरों के अजब नाम

अलवर में बालाजी के सैकड़ों मंदिर हैं, लेकिन कई मंदिर ऐसे हैं जो अपने अतरंगी नामों की वजह से लोगों को आकर्षित करते हैं।

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अलवर

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Umesh Sharma

Apr 02, 2026

अलवर. अलवर में बालाजी के सैकड़ों मंदिर हैं, लेकिन कई मंदिर ऐसे हैं जो अपने अतरंगी नामों की वजह से लोगों को आकर्षित करते हैं। बरसों पुराने इन मंदिरों में धोक लगाने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कई मंदिर सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित हैं, जहां दर्शनों के साथ-साथ लोग मनमोहक नजारों का भी आनंद ले सकते हैं। आज इसी तरह के मंदिरों के इतिहास से आपको रूबरू करवा रहे हैं।


पांडुपोल हनुमानजी: सरिस्का कोर एरिया में स्थित पांडुपोल हनुमान मंदिर अपनी खास पहचान के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के समय भीम ने गदा से पहाड़ तोडकर रास्ता निकाला था। भीम ने अपनी गदा से ऐसा प्रहार किया कि पहाड़ में आरपार छेद निकल गया। पहाड़ में बना यह दरवाजा ही पांडुपोल के नाम से विख्यात है। इसी स्थान पर हनुमानजी ने भीम का अहंकार तोड़ने के लिए वृद्ध वानर का रूप धारण कर भूमि पर लेटकर उनका मार्ग रोका था। माना जाता है कि उसी जगह आज उनकी यह प्रतिमा विराजमान है।

तारघर हनुमानजी: कंपनी बाग के पास स्थित तारघर हनुमान मंदिर करीब 80 साल पुराना है। मंदिर पुजारी हेमप्रकाश शर्मा ने बताया कि मंदिर के सामने तारघर होने की वजह से इसका नामकरण हुआ। यहां आज भी चिट्ठी लिखकर अर्जी लगाई जाती है और मान्यता है कि वह अर्जी पूरी होती है। शर्मा ने बताया कि हर साल हनुमान जन्मोत्सव, रामनवमी सहित कई त्योहार व पर्व पर यहां विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।


ग्रेजुएट हनुमानजी: भगत सिंह सर्किल के पास स्थित हनुमान मंदिर को 'ग्रेजुएट हनुमानजी' के नाम से जाना जाता है। करीब 160 साल पुराने इस मंदिर के सामने न्यू हायर सेकेंडरी स्कूल है। पं. बृजेश शर्मा ने बताया कि इस स्कूल से पास होने के कारण छात्र परीक्षाओं में सफलता और ग्रेजुएट होने का आशीर्वाद लेने आते हैं, जिससे इसे यह अनूठा नाम मिला। स्थानीय छात्रों और युवाओं का मानना है कि यहां मत्था टेकने से शिक्षा में सफलता मिलती है। यहां भगवान गणेश, शिव परिवार और राम दरबार भी विराजमान हैं।


रामायणी हनुमान मंदिर: प्रतापबंध रोड पर मिट्टी के टीले पर रामायणी हनुमान मंदिर बना हुआ है। यहां हनुमानजी की रामायण पढ़ते हुए प्रतिमा है, इसलिए मंदिर का नाम रामायणी हनुमान मंदिर पड़ा। मंदिर की विशेषता यह है कि हनुमानजी महाराज की प्रतिमा के चोला नहीं चढ़ाया जाता है। संगमरमर से निर्मित करीब 27 क्विंटल वजनी प्रतिमा रामायण पढ़ते हुए मुद्रा में विराजमान है। हनुमान जी के अलावा गोरखनाथ भैरवनाथ की भी प्रतिमा स्थापित है।


डंडे वाले हनुमानजी: दो सौ साल यह पुराना मंदिर पुराने अलवर की आस्था का केंद्र है। इसका नाम की महिमा भी अलग ही है। दरअसल, यह मंदिर शहर के परकोटा के पास है और डंडे पर ही विराजमान है, इसलिए इसका नाम डंडे वाला हनुमानजी पड़ा। मंदिर पुजारी पं. कुणाल शर्मा ने बताया कि मंदिर की स्थापना नहीं हुई थी। यह मूर्ति स्वयंभू है। सड़क से उंचाई पर होने की वजह से यहां से शहर के नजारे भी अद्भुत नजर आते हैं।


तोप वाले हनुमानजी: जैसा ही नाम से ही लग रहा है। यहां तोपें रखी थी, इस वजह से नाम तोप वाले हनुमानजी रखा गया। मंदिर की स्थापना करीब 400 साल पुरानी बताई जाती है। लोगों का कहना है कि इसका असली नाम मटियाकुंड हनुमानजी मंदिर, लेकिन पास में चक्रधारी हनुमानजी थे, इसलिए नाम तोप वाले बालाजी रख दिया गया।

भूरासिद्ध हनुमानजी: भूरा सिद्ध हनुमान मंदिर में हनुमान जी की 5 फीट प्रतिमा है, जो गर्भ ग्रह से निकली है। अरावली की पहाड़ियों से घिरे इस मंदिर की छटा निराली है। यहां रामचरितमानस का पाठ 16 जुलाई 2000 से लगातार आज तक चल रहा है। हर मंगलवार और शनिवार को यहां जबर्दस्त भीड़ उमड़ती है। यहां सवामणी के भी आयोजन होते हैं। हनुमानजी के अलावा यहां राम दरबार, राधा-कृष्ण, शिवालय और मां दुर्गा का मंदिर भी स्थित है।


चक्रधारी हनुमानजी: बाला किला क्षेत्र स्थित चक्रधारी हनुमान मंदिर करीब 800 साल पुराना है। यहां विराजित भगवान हनुमानजी की प्रतिमा को लेकर मान्यता है कि यहां चेतन प्रतिमा है। मंदिर में हनुमान प्रतिमा के हाथ में सुदर्शन चक्र है, इस कारण ही यह मंदिर चक्रधारी मंदिर कहलाता है। सरिस्का की बफर रेंज की पहाड़ियों में स्थित इस मंदिर को काफी चमत्कारिक माना जाता है।