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#khulkekheloholi समय के साथ बदलते गए इस त्यौहार के रंग, गुम हो गई चंग व ढप की आवाज

त्योहारों का सांस्कृतिक मिजाज ही भूल गए है

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अलवर

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Prem Pathak

Mar 01, 2018

holi tradition changing time to time

अलवर जिले के बहरोड़ में बदली संस्कृति के साथ राठ में भी होली के रंग बदल गए हैं। होली पर्व पर अब न तो रात को नौटंकी होती है और ना ही दिन में सांग निकलता है। वहीं ढप व चंग की ताल भी अब फीकी पड़ गई है।
होली पर्व पर रिश्तेदार, मित्रों और गांव के बड़े बुजुर्गो को होली की राम-राम श्याम-श्याम का सम्मान, समय था,कभी गले मिलकर देते थे की राम रमी और कभी, होली मनाते समय हुई कोई गलती की क्षमा बड़ों को प्रणाम कर मांगते थे।अब खेती बाड़ी और पशुपालन छोड़ कर पिछले डेढ़ दशक से जब से औधोगिक विकास और रियलस्टेट की चकाचौंध कमाई की बंयार चली है तब से राठ का नोजवान हो या फिर परिपक्वय नागरिक और किसान सब अपने परंपरागत काम धंधों के साथ साथ होली जैसे बार त्योहारों का सांस्कृतिक मिजाज ही भूल गए है।
बचपन में सदा होली का इंतजार रहता था, क्योंकि यही एक त्योहार था, जो जीवन को गीत, संगीत, के साथ दोस्ती और रिश्तेदारों से हर रोज मिलवाता था। राठ की रात को होली के दीवानों की टोली की नोटंकी होली के रसिया और सांग की एक अलग ही धूम रहती थी। वहीं दिन में भी ढप और चंग मंडली का नृत्य धमाल अलग ही रंग बिखेरता था।जिनकी तैयारी भी पन्द्रह दिनों से पहले दिल और दिमाग में छा जाती थी। उस समय स्वांग बन कर गांव के प्राय सभी घरों में होली के गीत गाने, हर मोहल्ले की टोली को बुलाया जाता था, रात को हर जगह चंग, ढोल, नृत्य के साथ ,गीतों की बहार छा जाती थी। इस रंग में प्राय: सब जाति के लोग उसमें पहुंच जाते थे। वहां ना तो कोई बड़ा होता था और ना ही कोई छोटा। अब तो होली मानो गली, मोहल्लों और सार्वजनिक चौपालों से निकल कर कमरों में बन्द हो गई।
बदली परम्परा, बदले रंग
पौराणिक मान्यताओं की रोशनी में होली के त्योहार का विराट समायोजन बदलते परिवेश में विविधताओं का संगम बन गया है। इस अवसर पर रंग, गुलाल डालकर अपने इष्ट मित्रों,प्रियजनों को रंगीन माहौल से सराबोर करने की परम्परा है, जो वर्षो से चली आ रही है। अब लोग रंग गुलाल से जैसे खेलना भूल गए हैं और कमरों में ही सिमट कर रह गए है
खत्म होगई होली क्रीड़ा
होली के त्योहार में विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाएं होती हैं। बालक गांव के बाहर से लकड़ी तथा कंडे लाकर ढेर लगाते थे। होली से कई दिन पहले ही रात को होने वाले स्वांग नौटकी डफ चंग की थाप पर नृत्य गीत सबकुछ ही खत्म हो गया है। स्थानीय ग्राम नांगल खोडिय़ा में होली के उत्सव में बजाया जाने वाला नगाड़ा, अब उपेक्षा का शिकार है।

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