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Alwar UIT: अलवर में 6 हजार हेक्टेयर पर नई कॉलोनियां बसाने का प्लान, लेकिन राह नहीं आसान, जानिए वजह

New Residential Colonies: राजस्थान के अलवर शहर में 6 साल में करीब 6 हजार हेक्टेयर भूमि पर आवासीय कॉलोनियां बसानी हैं।

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अलवर

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Anil Prajapat

Apr 04, 2026

new residential colonies

Photo: AI-generated

UIT Master Plan-2031: अलवर। यूआइटी साढ़े चार दशक में 5 हजार हेक्टेयर भूमि विकसित नहीं कर पाई। अब वर्ष 2031 तक यानी 6 साल में करीब 6 हजार हेक्टेयर भूमि पर आवासीय कॉलोनियां बसानी हैं। यह लक्ष्य यूआइटी ने मास्टर प्लान-2031 के तहत तय किया है।

पिछला रिकॉर्ड देखते हुए यह लक्ष्य पाना यूआइटी के लिए आसान नहीं होगा। ऐसा न होने पर यूआइटी के हाथ में जो भूमि है, वह भी निकल सकती है। यूआइटी के इस ढुलमुल रवैये की वजह से योजनाओं के लिए ली गई जमीन अतिक्रमण की भेंट भी चढ़ सकती है।

विकसित भूमि का लक्ष्य पिछड़ा

मास्टर प्लान 1988-2011 के तहत अलवर की 5 लाख आबादी के लिए 5 हजार हेक्टेयर जमीन विकसित करनी थी, जो 4070 हेक्टेयर तक ही हो पाई। इसमें करीब 370 हेक्टेयर क्षेत्र परिधि नियंत्रण पट्टी में विकसित हुआ, जिसमें मुख्यतः निजी बड़ी आवासीय कॉलोनियां, रिसॉर्ट, होटल, व शैक्षणिक संस्थान रहे। 1988 से अब तक यानी 2026 तक विकसित भूमि का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया।

जनसंख्या के हिसाब से फिट करने होंगे आंकड़े

वर्ष 2011 में अलवर की जनसंख्या 3.81 लाख थी। वर्ष 2031 में जनसंख्या बढ़कर 8 लाख होने का अनुमान है। यानी जनसंख्या में 4.29 लाख की बढ़ोतरी होने के आसार है। इन लोगों के रहने के लिए कार्यस्थल, सामुदायिक सुविधाओं आदि के लिए करीब 6 हजार हेक्टेयर भूमि चाहिए। सामान्य नगर नियोजन के मानदण्डों के अनुसार नगरीयकरण योग्य क्षेत्र का घनत्व 65 व्यक्ति प्रति हेक्टेयर है। ऐसे में करीब 6 हजार हेक्टेयर जमीन चाहिए। वर्तमान में यूआइटी के पास जो जमीनें है, वह अधिग्रहित नहीं की गई है।

जमीन अधिग्रहित नहीं

एमआइए स्कीम के अलावा साकेत, रोहिणी कॉलोनी के लिए 1200 बीघा जमीन 1998 में यूआइटी ने ली थी, लेकिन मुआवजा गिनती के किसानों को दिया गया। भूमि अधिग्रहण कानून के तहत यह जमीन स्वतः किसानों की हो जाती है, लेकिन यूआइटी जमीन को पकड़े हुए है। एमआइए स्कीम में कुछ जगहों पर अतिक्रमण बताया जा रहा है।

अंबेडकर नगर, विज्ञान नगर व शालीमार नगर में आधे भूखंड खाली

अंबेडकर नगर, विज्ञान नगर, शालीमार कॉलोनी धरातल पर करीब 20 साल पहले उतरी थी, जिनके आधे भूखंड अभी खाली है। यूआइटी ऑक्शन लगाती है, लेकिन भूखंड उतने नहीं बिक रहे, जितने प्राइवेट बिल्डर बेच रहे हैं। बिल्डर दो से चार माह में ही पूरे अपार्टमेंट की बुकिंग कर देते हैं, लेकिन यूआइटी 20 साल में यह कार्य नहीं कर पाई।

धरातल पर नहीं आ पाई कॉलोनी

मास्टरप्लान जनसंख्या के अनुमान के अनुसार बनाया जाता है। इसके अनुसार कार्य करने की दिशा मिलती है। यूआइटी ने 1998 में साकेत, रोहिणी, एमआइए कॉलोनी के लिए जमीन ली, लेकिन अब तक अधिग्रहण नहीं हो पाया। यानी 28 साल में कार्य की गति इस उदाहरण से देखी जा सकती है। एमआइए स्कीम में अतिक्रमण होने की बात सामने आ रही है। यदि समय रहते एमआइए स्कीम के अलावा साकेत, रोहिणी कॉलोनी जमीन पर नहीं आई तो उस जमीन पर भी अतिक्रमण हो जाएगा।
-प्रमोद शर्मा, पूर्व एक्सईएन, यूआइटी