
हॉपसर्कस : अलवर की हाल की घटनाओं को यहां पढ़ें अलग मजेदार अंदाज में
इनको सरिस्का भेजो बाघिन ढूंढऩे
चुनाव नजदीक आते ही नेताजी की शक और विश्वास की सुईं कुछ ज्यादा ही चलने लगी है। कहीं पर कोई अफवाह भी हो तो तुरंत उसकी पड़ताल तक पहुंचने लगे हैं। बात टिकट प्रतिद्वंद्वी की हो उसकी तो जड़ें तक खोद डालते हैं। इस समय विरोधियों का आपस में बचना मुश्किल हो रहा है। यदि कोई पार्टी जिले का एक टिकट इस आधार पर देना तय कर दे कि जो सरिस्का में खोई ही बाघिन का पता लगाएगा उसे ही टिकट मिलेगा। कसम से कुछ ही दिनों में मीडिया की यही खबर सुर्खियां बन जाए कि कई माह से लापता बाघिन के अवशेष मिले। ये बात अलग है कि आपसी होड़ में नेताजी सामने वाले पर यही आरोप जड़ दे कि बाघिन मरी नहीं मारी गई है। तभी तो इतनी जल्दी पता चल गया। हाल ही में टिकट की होड से ऊपर उठ चुके एक मंझे हुए नेताजी ने यह बात कही कि जनता में नेताजी का इतना खौफ हो गया है। अब इनको जमी जड़ें हिलने का डर सताने लगा है। जिसके कारण यह सब भूल गए कि कहां विरोध करना है कहां नहीं। लगता सलाहकार भी निबटाने में लगे हैं।
पगार का डर सताया तो भूल गए आंदोलन
अज्ञानता का अंधेरा दूर करने वाले विभाग के कुछ कर्मचारी पिछले दिनों बिना सोचे-समझे धरने पर बैठ गए। भाई लोगों को आंदोलन का नशा ऐसा कि अवकाश भी नहीं लिया। वैसे भाई लोग चतुर इतने कि आफिस में आकर पहले अपनी उपस्थिति करते और बाद में धरने पर बैठ जाते। ये खुद तो काम नहीं करते बल्कि अधिकारियों को भी कोई काम नहीं करने देते। तीन-चार दिन तो भाई लोगों के ऐसे ही निकल गए लेकिन यह खेल भी कितने दिन चलता। आखिरकार विभाग के बड़े अधिकारी ने साफ कह दिया कि आंदोलन करना है तो छुट्टी लेकर अनशन पर बैठे। भाई लोगों को पगार का भय सताया तो अनशन दूसरे दिन ही खत्म। अब लोग तो यहां तक कहने लगे कि इनको अनशन की नहीं छुट्टियों की चिंता ज्यादा है।
ऐसा भी क्या भय
अलवर में एक विभाग ऐसा भी है जहां पिछले 14 सालों से कोई साहब आने की हिम्मत ही नहीं करता। अजी हिम्मत तो दूर की बात, कोई इसके आसपास भी नहीं फटकता। जिले के आला अधिकारी हो या महकमें के बड़े साहब, इस कार्यालय की की दहलीज ही नहीं चढ़ते। भले ही उसे कोई बीमारी नहीं होने के खूब दावे करे, लेकिन साहब को इन दावों पर भी यकीन नहीं। तभी तो सरकारी आयोजनों में साहब लोग बाहर से ही रवानगी लेने में भलाई समझते हैं। वहीं कार्यालय में एक साहब यहां 14 साल से मजे में इलाज कर रहे हैं। अब ये साहब भी कहने लगे हैं कि बीमारी का डर ही सही, अपनी तो नौकरी तो मजे में कट गई।
इनको रखो दूर तो बनेगी बात
अबकी बार जनपद में नौकरी का सपना दिखाने की बजाय हाइटेक सुविधाओं वाला तामझाम लगाया गया। अंदरखाने काम भी हुआ लगता है। किसी बेरोजगार को शिकायती लहजे में नहीं देखा। किसीको परेशानी नहीं हो यह पूरा ध्यान रखा गया। अब विघ्न संतोषियों ने चर्चा छेड़ दी। अपने श्रेय लेने वालों को दूर क्यों रखा? चतुरसुजानों ने तपाक से जवाब दिया कि उपचुनाव भूल गए क्या? शहर के नजारे भी याद हैं। जानकारी है कि पूरे मेले की पल-पल की नजर ऊपर से रखी जा रही थी। ऐसे में घुसपैठ संभव नहीं थी। गाल बजाने का मौका भी नहीं मिला। यह जरूर है कि बेरोजगार जिन रास्तों पर चलकर आए थे उन रास्तों के हाल देखकर कईयों के मन बेहाल हो गए।
खुलकर कौन बोले
जिले में सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले चिंतित हैं। अपराध है कि कम होने का नाम नहीं ले रहा है। मुख्यालय से लेकर सीमावर्ती गांवों तक हर रोज बड़े-बड़े कारनामे आते हैं। कहीं की भी मुसीबत हो अलवर में आकर ही प्रवास करती है। महकमे के सभी जिम्मेदार चिंतित हैं। एक भाई की दुखती रग पर हाथ रखा तो बोले भईया यहां खुलकर कोई नहीं बोल रहा है। एक तो लोग कम। ऊपर से ऊपर वाले तो बदल गए हैं लेकिन नीचे ऐसा जाल फैला हुआ है कि हम चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते। बात आगे बढ़ाई तो भाईजी चुप हो गए। बोले हमारी कौन सुनेगा? जब तक नीचे तक बदलाव नहीं होगा तब तक काबूू पाना मुश्किल है।
Published on:
21 Aug 2018 05:07 pm
बड़ी खबरें
View Allअलवर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
