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टैंकर मंगा कर सरसों के खेत में सिंचाई, खेती का कामकाज हुआ महंगा, पानी पहुंच रहा पाताल, पुराने ट्यूबवेल हुए फेल

उपखंड क्षेत्र में लगातार तेजी से गिरते भूजल स्तर से अब परंपरागत खेती करना किसानों के लिए बर्बादी का सबब बन रही है।

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मालाखेड़ा. उपखंड क्षेत्र में लगातार तेजी से गिरते भूजल स्तर से अब परंपरागत खेती करना किसानों के लिए बर्बादी का सबब बन रही है। इतना ही नहीं, गिरते भूजल स्तर से पानी पाताल जा रहा है, जिससे पुराने ट्यूबवेल फेल होने लगे हैं। जहां अब रबी की फसल सरसों की सिंचाई के लिए खेतों के पास जहां ट्यूबवेल नहीं है, वहां पानी के टैंकर तथा जिस खेतों के आसपास दूसरे किसानों के ट्यूबवेल हैं उनसे प्रति घंटा के हिसाब से पानी खरीद कर सरसों फसल की सिंचाई करना किसानों की मजबूरी बन गई।

चौमू गांव मुख्यालय के मुख्य सड़क मार्ग पर सिंचाई का ट्यूबवेल खराब होने के बाद अब मजबूर होकर पानी के टैंकर मांगने पड़ रहे हैं। जहां एक बीघा में करीब 3000 का खर्चा आ रहा है। किसान सुरेंद्र, नरेंद्र, जगराम आदि ने बताया कि अभी सिंचाई नहीं होगी तो फिर सर्दी से पूरी फसल नष्ट हो जाएगी। इसलिए मजबूरी में टैंकर मंगा कर सिंचाई कर रहे हैं। इसी गांव के राकेश सिंह, बच्चू सिंह, मूलसिंह, सरदारसिंह, भगवान सिंह, राधाकृष्ण गुर्जर का कहना है कि पीने के पानी का ही संकट बना हुआ है। ऐसे में रबी की फसल में अधिकतर सरसों की बुवाई की गई है।

इस बार लगातार बारिश के कारण सरसों की बुवाई तो हो गई, लेकिन अब सिंचाई में संकट हो गया। पड़ोस वाले किसान जिसके पास ट्यूबवेल में पानी है, उससे 200 रुपए प्रति घंटा के हिसाब से सिंचाई कर रहे हैं। खेती मानसून का जुआ है। भविष्य में कितनी पैदा होगी या क्या भाव रहेगा। इसका कोई अंदाजा नहीं है। फिर भी परिवार के पालन पोषण व आर्थिक उत्थान के लिए की जा रही खेती अब घाटे का सौदा साबित होने लगी है।