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शहरों की ओर रोकना होगा पलायन…गांवों की पूंजी गांवों पर ही खर्च होनी चाहिए

गांवों से आबादी का पलायन शहरों की ओर हो रहा है। ये पलायन अच्छा संकेत नहीं है। गांवों में ही असली भारत है और वहीं पर बसना चाहिए। ऐसे में गांवों का विकास भी जरूरी है, इसके बाद ही पलायन शहरों की ओर रुकेगा। ये बातें देश के नंबर-1 सीमेंट अल्ट्राटेक और राजस्थान पत्रिका की अनूठी पहल यशस्वी सरपंच के अलवर जोन के सम्मान समारोह में पेनलिस्ट ने कही।

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अलवर

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susheel kumar

Apr 04, 2024

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- राजस्थान पत्रिका व अल्ट्राटेक सीमेंट के यशस्वी सरपंच सम्मान समारोह में पेनलिस्ट ने कहीं ये बातें

- बोले- पंचायत राजनीति की पहली सीढ़ी, इसे चढ़ने में महिलाएं सफल, समय-समय पर ट्रेनिंग जरूरी

गांवों से आबादी का पलायन शहरों की ओर हो रहा है। ये पलायन अच्छा संकेत नहीं है। गांवों में ही असली भारत है और वहीं पर बसना चाहिए। ऐसे में गांवों का विकास भी जरूरी है, इसके बाद ही पलायन शहरों की ओर रुकेगा। ये बातें देश के नंबर-1 सीमेंट अल्ट्राटेक और राजस्थान पत्रिका की अनूठी पहल यशस्वी सरपंच के अलवर जोन के सम्मान समारोह में पेनलिस्ट ने कही।

पैनल डिस्कशन का विषय क्या ग्रामीणों में नई आशा और विश्वास पैदा कर सकती है पंचायती राज व्यवस्था, रहा। पेनलिस्ट ने कहा, गांवों की पूंजी गांवों पर ही खर्च होनी चाहिए। टैक्स जुटेगा तो विकास कार्यों पर खर्च होगा। गांव चमकेंगे तो देश आगे बढ़ेगा। पेनलिस्ट सदस्यों में यूआईटी अलवर से सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता धर्मेंद्र शर्मा, सेवानिवृत्त कार्यवाहक प्राचार्य बाबू शोभाराम महाविद्यालय अलवर जीवन सिंह मानवी व वरिष्ठ इतिहासकार हरिशंकर गोयल रहे। पेश है उनसे बातचीत के अंश-

सवाल : गांवों के लोग पंचायती राज की आवश्यकता और महत्व को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे? उनके सामने कौनसी रुकावटें आ रही हैं?
जवाब : पंचायती राज की मूल भावना 1952 में लागू हुई। उसके बाद से गांवों में रोशनी की किरण फूटी लेकिन इससे पूरी रोशनी इसलिए नहीं हो पाई कि अज्ञानता व निर्धनता इसका कारण रही। लोगों में कम समझ के कारण विकास नहीं हो पाया लेकिन अब धीरे-धीरे लोगों की समझ बढ़ गई। जागरूक हो गया। वह खुद राजनीति में आकर गांवों का विकास करना चाहते हैं।

सवाल : पंचायती राज में दलगत राजनीति हावी हो रही है। राजनीतिक दलों का पंचायतों में हस्तक्षेप इसका बड़ा कारण तो नहीं?
जवाब : राजनीति जीवन का अंग है। सरपंच राजनीति की पहली कड़ी हैं। राजनीतिक दलों के अपने-अपने सरपंच हो गए हैं। ऐसे में ये अलग नहीं हो सकते हैं। राजनीति का शुद्ध रखने के लिए ग्रामीणों को समय-समय पर अपनी ताकत दिखानी पड़ेगी। बदलाव के कारण नए विचारों का उदय होगा और गांवों में विकास होगा।

सवाल : पंचायतें सरकारी अनुदान पर निर्भर हैं। अपनी आय के साधन जुटाने में अभी उन्हें सफलता पूरी तरह नहीं मिल पा रही है?
जवाब : गांवों की आबादी का पलायन शहरों की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में वहां की पूंजी शहरों में आ रही है। गांव में ही लोग रुकें और वहीं पर पूंजी खर्च करें। टैक्स दें तो इससे गांवों में नए प्रोजेक्ट लॉंच होंगे और विकास कार्य होंगे। आय के साधन भी तभी बढ़ पाएंगे। गांवों के लोगों पर दबाव कम करना होगा। खेती पर और जोर देना होगा।

सवाल : पंचायती राज की सफलता में राजनीतिक जागरुकता की कमी भी एक महत्वपूर्ण समस्या है?
जवाब : बिना राजनीति के पंचायतों का चलना संभव नहीं है। इसके लिए ग्रामीणों को भी समय-समय पर जागना होगा और सरपंच आदि को भी स्वस्थ मानसिकता को ध्यान में रखते हुए प्रोजेक्ट बनाने होंगे और उसी अनुसार राजनीति करनी होगी। द्वेष की राजनीति से गांव का विकास ही नहीं एक सोच पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

सवाल : महिला आरक्षण अर्थहीन लगने लगा है? सरपंच या प्रधानपति गांवों की सरकारें चलाते हैं? ऐसे में अन्य महिलाएं राजनीतिक रूप से आगे नहीं बढ़ पातीं?
जवाब: वर्ष 1995 तक सीधे सरपंच के रूप में महिलाएं नहीं चुनी गईं। उसके बाद जिन परिवारों में लोग राजनीति में आए, उन्होंने महिलाओं को राजनीति में उतारा। आज महिला सरपंच हों या फिर प्रधान। ये काफी जागरूक हुई हैं। खुद निर्णय ले रही हैं। ध्यान देने की बात ये है कि सरकारें इन्हें समय-समय पर ट्रेनिंग आदि देकर आगे बढ़ाने का प्रयास करे।