
अलवर. पुस्तकों का महत्व बताने और पुस्तकों में आमजन की रुचि जागृत करने के लिए मनाया जाने वाले विश्व पुस्तक दिवस को सरकारी महकमा ही भुला बैठा । एक और विभाग के मंत्री सोशल मीडिया पर विश्व पुस्तक दिवस की बधाईयां दे रहे हैं वहीं दूसरी तरफ अलवर की पुस्तकालय इस दिन से पूरी तरह अंजान हैं। अलवर में सरकारी बजट से चलाई जा रही किसी भी लाइब्रेरी में 23 अप्रेल को कोई आयोजन नहीं हुआ। जब राजस्थान पत्रिका ने शहर में स्थित लाइब्रेरियों में जाकर इस संबंध में बात की तो पता चला कि यहां किसी को यह पता ही नहीं है कि 23 अप्रेल को विश्व पुस्तक दिवस भी मनाया जाता है।
नगर परिषद की ओर से पुराना सूचना केंद्र में चलाई जा रही लाइब्रेरी में बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त थे । यहां के लाइब्रेरियन किशनलाल ने बताया कि उन्हें 23 अप्रेल को मनाए जाने वाले पुस्तक दिवस के बारे में कोई जानकारी नहीं है और न ही इसके लिए विभाग की ओर से कोई निर्देश और बजट जारी किया गया है।
इधर, भाषा एवं पुस्तकालय विभाग की ओर से चलाई जा रही राजकीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय सार्वजनिक जिला पुस्तकालय में भी कोई आयोजन नहीं हुआ। पुस्तकों से जुड़े इस विशेष दिवस को भुला दिया गया। यहां कार्यरत लाइब्रेरियन शिवचरण शर्मा ने बताया कि पहले इस दिन पुस्तकों की प्रदर्शनी लगाई जाती थी। लेकिन अबकी बार कोई आयेाजन नहीं किया गया है।
आर्टस कॉलेज में संचालित लाइब्रेरी में जाकर जब विश्व पुस्तक दिवस पर होने वाले आयोजन के बारे में पूछा गया तो लाइब्रेरियन का कहना था कि उन्हें नहीं पता कि आज विश्व पुस्तक दिवस भी मनाया जाता है। इसलिए कोई आयोजन भी नहीं किया गया।
शेक्सपीयर को समर्पित है यह दिन गौरतलब है कि डिजिटलाइजेशन के युग में लोगों का रूझान पुस्तकों के प्रति कम हो रहा है। युवा नेट के मोहजाल से फंसकर पुस्तकों से दूरियां बना रहे हैं। ऐसे में पुस्तकों का उपयोग नहीं हो पा रहा है। किताबों और लोगों के बीच की दूरियों को कम करने के लिए यूनेस्को की ओर से 1995 में 23 अप्रेल का दिन विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया गया। भारत में 2001 से 23 अप्रेल को विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। इस दिन वर्षों पूर्व विलियम शेक्सपीयर और इंका गार्सिलासो डीला बेगा ने दुनिया केा अलविदा कहा था।
Published on:
24 Apr 2018 02:23 pm
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