अलवर. मनरेगा के मजदूरों को समय से मजदूरी भले ही नहीं मिल पाती हो लेकिन यहां ऐसी सामग्री मनरेगा के बजट से खरीदी जा रही हैं जो प्रतिबंध है। बानसूर के बाद अब रामगढ़ पंचायत समिति ने 21 लाख रुपए की दरियां मनरेगा के फंड से खरीदी हैं। यानी इसकी अनुमति योजना देती ही नहीं लेकिन खरीद ली गईं।
मनरेगा : बानसूर के बाद अब रामगढ़ में खरीद डाली 21 लाख की दरियां
- उसी कंपनी से ये दरियां मंगवाई गईं जिसने बानसूर में मुहैया कराई, इसमें कमीशन का खेल बताया जा रहा- मनरेगा के प्रशासनिक मद से दरियां नहीं खरीदी जा सकती, लेकिन यहां खेल बदस्तूर, जिला परिषद के अफसर भी मौज में
अलवर. मनरेगा के मजदूरों को समय से मजदूरी भले ही नहीं मिल पाती हो लेकिन यहां ऐसी सामग्री मनरेगा के बजट से खरीदी जा रही हैं जो प्रतिबंध है। बानसूर के बाद अब रामगढ़ पंचायत समिति ने 21 लाख रुपए की दरियां मनरेगा के फंड से खरीदी हैं। यानी इसकी अनुमति योजना देती ही नहीं लेकिन खरीद ली गईं। जिला परिषद के अफसरों का इन सभी को पहले से संरक्षण है। यहां तैनात रहे पूर्व अधिकारियों के संरक्षण में ये पूरा खेल चला। यही कारण है कि न कार्रवाई हुई और न वसूली।
मनरेगा के प्रशासनिक मद से कार्यालय सामग्री ही खरीदी जा सकती हैं। वह भी कुछ ही पैसों से। लाखाें रुपए के सामान की खरीद करने की अनुमति ये योजना नहीं देती। अधिकांश पैसा मजदूरों की पगार के लिए आता है जो कहीं पर समय पर मिलता है तो कहीं पर मजदूरों को पसीना बहाना पड़ता है। मजदूरों के हक के लिए आई इस रकम को ठिकाने लगाने के लिए पंचायत समितियां दरियां खरीदने में जुटी हैं। रामगढ़ में जयपुर की एक संस्था से 21 लाख की दरियां खरीदने का ऑर्डर दिया है। बताते हैं कि ये दरियां आ भी गई हैं। हालांकि ये जांच का विषय है। इतनी मोटी रकम से ये दरियां क्यों खरीदी गई? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। वहीं दूसरी ओर बानसूर में भी करीब 12 लाख रुपये से दरियां खरीदी गई थीं। उस मामले में भी जिला परिषद के अफसरों ने पर्दा डाल दिया जबकि ये एक तरह की वित्तीय अनियमितता है।
मनरेगा के प्रशासनिक मद से दरियां खरीदी गई हैं लेकिन ये दरियां आई हैं या नहीं, इसकी जानकारी मुझे नहीं है। इसके बारे में पता करवाएंगे।
-- राम दयाल, बीडीओ रामगढ़