
वनवास से बाहर नहीं आ पा रही पार्टियां
कांग्रेस व भाजपा को इन सीटों पर मिला है 'वनवास', घर लौटने को झोकी ताकत
- किशनगढ़बास, शहर, थानागाजी, राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ सीटों के परिणामों ने लोगों को कई बार चौंकाया
- प्रमुख दल इस बार बदल रहे रणनीति, दूसरे दलों ने भी अपने तरीके से की तैयारी, निर्दलीय भी मैदान में
अलवर. प्रदेश में सत्ता की चाबी कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा के हाथ रही है लेकिन जिले की कई विधानसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर कांग्रेस व भाजपा को कई वर्ष से वनवास मिला हुआ है। यानी इन पार्टियों के प्रत्याशी नहीं जीत पा रहे हैं। किसी पर कांग्रेस का कब्जा है तो किसी पर भाजपा का। दूसरे दल भी कई बार काबिज हुए। निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। इस बार के चुनाव में दोनों ही प्रमुख दल वनवास काटकर सत्ता में आना चाहते हैं। वह जीत के सपने इन विधानसभा सीटों से देख रहे हैं। वहीं दूसरे दल भी दिन-रात तैयारियों में जुटे हैं।
किशनगढ़बास पर भाजपा व बसपा का कब्जा
वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद नई विधानसभा किशनगढ़बास बनी। यहां 2008 में और 2013 में भाजपा के राम हेत सिंह यादव जीते और 2018 में बसपा के टिकट से दीपचंद खैरिया ने जीत दर्ज की। सीट के गठन के बाद से आज तक कांग्रेस पार्टी को जीत नहीं मिली। यहां करीब 15 साल से कांग्रेस चुनावी मैदान में बाजी नहीं मार पाई।
शहर सीट पर कांग्रेस आने को आतुर
वर्ष 2008 में ही अलवर शहर नई विधानसभा सीट बनी। यहां वर्ष 2008 और 2013 में भाजपा के टिकट से बनवारी लाल सिंघल ने जीत दर्ज की और वर्ष 2018 में भाजपा के टिकट से ही संजय शर्मा जीते। यहां भी कांग्रेस लंबे समय से सीट पर कब्जा नहीं जमा पाई।
थानागाजी से 1998 में जीती थी कांग्रेस
थानागाजी विधानसभा सीट पर अंतिम बार कांग्रेस को वर्ष 1998 में जीत मिली थी। उस समय कांग्रेस के प्रत्याशी कृष्ण मुरारी गंगावत यहां से चुनाव जीते थे। इसके बाद दो बार निर्दलीय कांतिलाल मीना और दो बार भाजपा के हेम सिंह भडाना यहां से विधायक बने हैं। यहां भी 20 साल से कांग्रेस को जीत का इंतजार है।
राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ से भाजपा नहीं जीत पाई
साल 2008 में नए विधानसभा क्षेत्र राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ बना। यहां पर नए परिसीमन से आज तक भाजपा नहीं जीत पाई। 2008 में समाजवादी पार्टी के सूरजभान धानका, 2013 में राजपा की गोलमा देवी और 2018 में कांग्रेस के जोहरी लाल मीणा को जीत मिली। यहां 15 साल से भाजपा के दांव नहीं लग पा रहे हैं। इसी तरह मुंडावर व तिजारा में पिछले 10 साल से कांग्रेस को जीत नहीं मिली है। बानसूर में भाजपा 10 साल से सत्ता में नहीं आ पाई। इस बार राजनीतिक दल इस बनवास को तोड़ने की कोशिश में हैं। उसी के मुताबिक रणनीति बनाई जा रही हैं।
Published on:
20 Sept 2023 11:21 am
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