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पत्रिका टॉक शो: अलवर का एक्यूआई दिल्ली से आधा, फिर पाबंदियां पूरी क्यों?

प्रदूषण का स्तर बढ़ते ही एक बार फिर एनसीआर में ग्रेप-4 की पाबंदियां लागू हो गई है। इन पाबंदियों से अलवर के उद्योगों पर विपरीत असर पड़ता है। उद्योगपतियों का कहना है कि जब अलवर का एक्यूआई दिल्ली का आधा है तो पाबंदिया एनसीआर की तरह पूरी क्यों लगाई जा रही हैं?

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प्रदूषण का स्तर बढ़ते ही एक बार फिर एनसीआर में ग्रेप-4 की पाबंदियां लागू हो गई है। इन पाबंदियों से अलवर के उद्योगों पर विपरीत असर पड़ता है। उद्योगपतियों का कहना है कि जब अलवर का एक्यूआई दिल्ली का आधा है तो पाबंदिया एनसीआर की तरह पूरी क्यों लगाई जा रही हैं? उद्योगपतियों ने एक बार फिर अलवर को एनसीआर से बाहर करने की मांग दोहराई ताकि उद्योगों को जिले के विकास को पंख लग सकें। राजस्थान पत्रिका ने इस मुद्दे को लेकर बुधवार को एमआईए में टॉक-शो आयोजित किया। इसमें व्यापारियों ने कहा कि ग्रेप की पाबंदी अलवर में एयर क्वालिटी इंडेक्स के अनुसार लगानी चाहिए।

अलवर को एनसीआर योजना का कोई फायदा नहीं मिल रहा है, जबकि हर साल लगने वाले ग्रेप के कारण नुकसान होता है। यहां पर उद्योग भी प्रभावित होने लगे हैं। ग्रेप की पाबंदी अलवर के एक्यूआई के अनुसार लगानी चाहिए। कई बार केन्द्र सरकार को प्रतिवेदन दिया जा चुका है।

अजय बंसल, सचिव, मत्स्य मिनरल संघ

अलवर को एनसीआर से बाहर करने के लिए सरकार को कई बार प्रतिवेदन भेजा गया है। ग्रेप-4 लगने से यहां पर 300 करोड़ रुपए प्रतिमाह का नुकसान हो रहा है। ग्रेप लगने से मजदूर वर्ग पलायन करने लग गया है। बेरोजगारी की समस्या हो रही है जो अलग। व्यापारियों को कंपनियों का लोन भी भरने में परेशानी हो रही है। – अजय आनंद, मत्स्य क्षेत्र उद्योगपति

हर साल ग्रेप की पाबंदी लगने के साथ ही खनन बंद हो जाता है। वर्तमान में अलवर जिले में 400 उद्योग इकाईयां बंद है। अलवर को एनसीआर से बाहर करने की जरूरत है या फिर अलवर में एक्यूआई के आधार ग्रेप की पाबंदी लगानी चाहिए। दिल्ली और अलवर के प्रदूषण में बहुत अंतर होता है। अलवर का 150 और दिल्ली का एक्यूआई 400 से ज्यादा रहता है, लेकिन पाबंदी दिल्ली वाली लगाई जाती हैं। –तिलक जैन, मत्स्य क्षेत्र उद्योगपति