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कोरोना की प्रोपर्टी पर मार, लेकिन अलवर में जमीनों के भाव कर रहे महंगाई को पार, 100 वर्गमीटर का प्लॉट 20 लाख से ज्यादा

कोरोना के चलते प्रोपेर्ट के भाव गिर रहे हैं लेकिन अलवर में भाव बहुत अधिक हैं।

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अलवर

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Lubhavan Joshi

Aug 24, 2021

Property Rates Are Very High In Alwar

कोरोना की प्रोपर्टी पर मार, लेकिन अलवर में जमीनों के भाव कर रहे महंगाई को पार, 100 वर्गमीटर का प्लॉट 20 लाख से ज्यादा

अलवर. कोरोना की मार के कारण प्रोपर्टी के भाव औंधे मुंह गिर रहे हैं लेकिन अलवर जिले में जमीनों के भाव बहुत तेजी पर हैं। यहां यूआईटी सहित रेगूलाइज कॉलोनियों में प्लॉट खरीदना बहुत महंगा हो गया है। अलवर शहर में यूआईटी की किसी भी कॉलोनी में 100 वर्गमीटर का एक प्लॉट ही 20 लाख रुपए से कम में नहीं मिल सकता है।

अलवर में मकान बनाना आसान नहीं है। यहां प्रोपर्टी के भाव प्रदेश की राजधानी जयपुर से कहीं अधिक हैं। पिछले 21 सालों में यूआईटी ने किसी भी आवासीय कॉलोनियों में लॉटरी से प्लॉट आवंटित नहीं किए हैं। वर्षों से यहां नीलामी में प्लॉट बेचे जा रहे हैं।

यदि नीलामी में कम से कम 100 वर्ग मीटर का प्लॉट भी खरीदना हैं तो 20 लाख रुपए की राशि देनी होगी। अलवर में इन दिनों विज्ञान नगर, शालीमार नगर आवासीय योजना, अशोक विहार, मोती डूंगरी, शिवाजी पार्क, स्कीम नम्बर 8, सूर्य नगर, अम्बेडकर नगर, वैशाली नगर और बुध विहार में प्लॉट बिकाऊ हैं लेकिन यूआईटी की आवासीय योजनाएं एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से दूर होती जा रही हैं।

21 साल से प्लाट नहीं निकला लाटरी से-

यूआईटी ने 2000 में लाटरी से प्लॉट निकाले थे जो अम्बेडकर नगर में थे। इसके बाद एक भी आवासीय योजना में प्लॉट लाटरी से निकलना ही बंद हो गए। इसका कारण यूआईटी के अधिकारी यह बताते हैं कि उनको सरकार से सिवायचक जमीन मिलना ही बंद हो गई। कोई भी आवासीय योजना में उसका 55 प्रतिशत भाग तो सडक़, सामुदायिक भवन और पार्क जैसी सुविधाओं के लिए चला जाता है।

25 प्रतिशत भूमि किसान को विकसित देनी होत है। अब तो जमीन 20 प्रतिशत बची जिसकी लागत ही इतनी अधिक होती है कि उसे नीलामी में बेचने पर ही मुनाफा हो सकता है।कृषि भूमि में काट रहे प्लॉट-यूआईटी के प्लॉट महंगे होने से लोग भूमाफियाओं के चक्कर में फंसकर बिना भूमि रूपान्तरण किए हुए प्लॉट ही खरीद लेते हैं। इससे उन्हें मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिल पाती हैं। अलवर शहर में हर साल कई नई कॉलोनियां कृषि भूमि में ही कट जाती हैं।