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Sariska Tiger Reserve: बाघ तो बचा लिए, अब पर्यटन को प्राणवायु की दरकार

वर्ष 2005 में बाघ विहिन घोषित किए जाने के बाद सरिस्का में बाघ वापस जिंदा हो 23 तक पहुंच गए, लेकिन पर्यटन को पंख नहीं लगने से सरिस्का का गायब हुआ नूर अभी पटरी नहीं आ पाया है।

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अलवर

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Hiren Joshi

Sep 22, 2021

Sariska Tiger Reserve Tourism Sariska News

Sariska Tiger Reserve: बाघ तो बचा लिए, अब पर्यटन को प्राणवायु की दरकार

अलवर. बाघ विहिन होने के बाद सरिस्का बाघ परियोजना में बाघ जिंदा हो गए, लेकिन अभी पर्यटन को प्राणवायु की दरकार है। टाइगर रिजर्व रणथंभौर की तुलना में सरिस्का में पर्यटकों की संख्या 10 गुना से भी कम है। सरिस्का में पर्यटन को प्राणवायु नहीं मिल पाने से अलवर जिला विकास की रफ्तार में सवाई माधोपुर से पीछे ही रहा है।

वर्ष 2005 में बाघ विहिन घोषित किए जाने के बाद सरिस्का में बाघ वापस जिंदा हो 23 तक पहुंच गए, लेकिन पर्यटन को पंख नहीं लगने से सरिस्का का गायब हुआ नूर अभी पटरी नहीं आ पाया है। यही कारण है कि राजधानी दिल्ली व जयपुर के मध्य स्थित होने के बाद भी सरिस्का अभी पर्यटकों की पहुंच से दूर ही बना हुआ है, जबकि रणथंभोर टाइगर रिजर्व बड़े शहरों की पहुंच से दूर होने के बाद भी पर्यटकों के लिए आकर्षण बन गया है।

ठहरने की अच्छी सुविधा से पर्यटक पहुंच रहे रणथंभौर

विदेशी एवं देशी पर्यटकों की पहली जरूरत पर्यटन स्थल पर ठहरने की अच्छी व्यवस्था रहती है। रणथंभौर में सभी कैटेगरी के करीब 125 होटल हैं। इन होटलों में पर्यटकों की आर्थिक स्थिति अनुसार ठहरने की व्यवस्था है। अनुमान के तौर पर रणथंभौर मे पर्यटकों के लिए 500 रुपए से लेकर 5000 रुपए प्रतिदिन किराए पर होटल में कमरे की सुविधा है। जबकि सरिस्का में अच्छे होटल की कमी है। यहां एक-दो बड़े श्रेणी के होटल में आम पर्यटक का रुक पाना संभव नहीं हो पाता। सरिस्का के आसपास अवैध तरीके से बने होटलों में पर्यटकों के अनुरूप सुविधा नहीं मिल पाती। यही कारण है कि पर्यटक सरिस्का के बजाय रणथंभौर जाना ज्यादा पसंद करता है।

सरिस्का में जोन की कमी भी बाघों की साइटिंग में बाधक

सरिस्का में पर्यटकों के लिए दो- तीन जोन ही हैं, जिन पर पर्यटक बाघों की साइटिंग के लिए सफारी कर सकता है, इनमें एक जोन पाण्डुपोल हनुमान मंदिर का है। इस जोन पर धार्मिक पर्यटन के लिए जाने वाला पर्यटक सहज ही सरिस्का भी घूम लेता है। इस कारण सरिस्का में पर्यटकों की संख्या में कमी रही है और राजस्व को भी बड़ा नुकसान हुआ है। जबकि रणथंभौर में वर्तमान में पर्यटकों के लिए 10 जोन हैं। जोन ज्यादा होने से पर्यटकों के लिए घूमने के विकल्प ज्यादा है। इस कारण रणथंभौर में बाघों की साइटिंग का प्रतिशत सरिस्का से बहुत ज्यादा है।

मानवीय दखल होने से सरिस्का में बाघों में ब्रिडिंग कम

सरिस्का में मानवीय दखल रणथंभौर की तुलना में ज्यादा है। सरिस्का बाघ परियोजना व आसपास करीब 29 गांव बसे हैं। इनमें से 9 गांवों का विस्थापन प्राथमिकता से होना था, लेकिन धीमी विस्थापन प्रक्रिया के चलते अभी तक इनमें से तीन गांव पूरी तरह विस्थापित हो पाए हैं और दो गांवों में विस्थापन प्रक्रिया जारी है। जबकि रणथंभौर में ज्यादातर गांवों का विस्थापन हो चुका है, इस कारण वहां मानवीय दखल कम होने से बाघों में ब्रिडिंग सरिस्का से कई गुना ज्यादा है। तभी रणथंभौर में बाघों की संख्या 70 से ज्यादा है और सरिस्का में अभी 23 ही बाघ व शावक हैं।

संसाधन पर्याप्त होने से पर्यटक करता है दो से तीन ट्रिप

रणथंभौर में होटल व अन्य संसाधन पर्याप्त होने से पर्यटक दो से तीन ट्रिप भी कर लेता है, जिसमें उसे बाघ सहज ही दिखाई दे जाता है, लेकिन सरिस्का में अच्छे होटलों व संसाधनों की कमी के चलते पर्यटक ज्यादा दिन रूक नहीं पाते और सरिस्का में एक ही ट्रिप कर पाता है, जिसमें कई बार उसे बाघ दिखाई नहीं देता। इससे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पटल पर सरिस्का की छवि भी प्रभावित होती रही है।

फेयरी क्वीन के फेरे, वॉल्वो सेवा हो शुरू

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शामिल अलवर दिल्ली से आने राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आसानी से लुभा सकता है। कुछ साल पहले ही विश्व विख्यात फेयरी क्वीन पर्यटकों को अलवर लाती थी, जो सरिस्का भ्रमण करते थे। ऐसी पहल की अब दरकार है। इसके साथ ही रोडवेज को अलवर से दिल्ली-जयपुर वॉल्वो सर्विस शुरू करनी चाहिए। इस कदम से रेलवे रोडवेज की कमाई के साथ बाघ पर्यटन को गति मिलना तय है।

लोगों की कम स्वीकार्यता भी बड़ी बाधा

रणथंभौर टाइगर रिजर्व की तुलना में सरिस्का बाघ परियोजना में पर्यटन में वृद्धि के प्रति राजनीतिक व आसपास रहने वाले लोगों की स्वीकार्यता कम रही है। जबकि रणथंभौर में राजनीतिक दखल व अन्य लोगों की दखल कम है। यही कारण है कि रणथंभौर में पर्यटन व्यवसाय तेजी से बढ़ा। इसका सीधा लाभ सवाई माधोपुर जिले के विकास को मिला, जबकि अलवर जिला पर्यटन व्यवसाय में पिछड़ा ही रहा।