
स्वामी विवेकानंद का अमरीका के शिकागो में दिए भाषण की खास बातें, जिन्होंने विश्व में भारत की छवि को मजबूती से पेश किया था
अलवर. 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में जन्में नरेन्द्र आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से मशहूर हुए। 127 साल पहले दुनिया को जगाने आया सन्यासी नरेन्द्र से विवेकानंद बनने की यात्रा में कई बार अलवर आए। उनका अलवर से खास लगाव रहा। वे शिकागो जाने से पूर्व और बाद में कई बार अलवर आए। आज हम बात कर रहे हैं स्वामी विवेकानंद के शिकागो में धर्म संसद में साल 1893 में दिए गए भाषण की। स्वामी विवेकानंद का जब भी जिक्र होता है तो उनके अमरीका में दिए गए भाषण की चर्चा अवश्य होती है।
स्वामी विवेकानंद ने इस भाषण के माध्यम से समूची दुनिया के समक्ष भारत को एक मजबूत छवि के साथ पेश किया। स्वामी विवेकानंद ने उस भाषण में अमरीकी लोगों को भाइयों बहनों कहकर संबोधित किया था। उनके इस संबोधन के बाद कई मिनट तक तालियां बजती रही।
स्वामी विवेकानंद के अमरीका मे दिए गए भाषण की खास बातें-
- मेरे अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है उससे मेरा दिल भर आया है। मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं और सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं।
-मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी है, जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है, मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया। हम सर्वभौमिक सहिष्णुता पर विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।
-मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी, मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली, मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है।
- मैं इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हू जो मैंने बचपन में याद किया और जिसे रोज करोड़ों लोग दोहराते हैं, उन्होंने संस्कृत एक श्लोक सुनाया जिसका हिंदी मे अर्थ है, जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद्र में जाकर मिल जाती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है, जो देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, परंतु सभी ईश्वर तक ही जाते हैं।
-सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशजों के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड़ रखा है, उन्होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और यह धरती जाने कितनी बार खून से लाल हो चुकी है। न जाने कितनी सभ्यताएं तबाह हुईं और कितने देश मिटा दिए गए, लेकिन अब इनका समय पूरा हो चुका है। मुझे उम्मीद है कि इस सम्मलेन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा, चाहे वह तलवार से हो या कलम से। यह सम्मेलन सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावना को समाप्त करेगा।
Published on:
12 Jan 2019 10:36 am
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