
बच्चों को पढ़ाई कराती संगीता (फोटो - पत्रिका)
कभी बीन की धुन और सांपों से जुड़ी परंपरागत पहचान के लिए जानी जाने वाली सपेरा बस्ती में अब शिक्षा की नई रोशनी फैलने लगी है। सपेरा जाति में जन्म लेने वाली गुलाबो सपेरा ने अपनी नृत्य कला से देश-विदेश में भारत को पहचान दिलाई है, इसी जाति में जन्मी अलवर की संगीता सपेरा अब शिक्षित होकर प्रशासनिक अधिकारी बनकर समाज की सेवा करना चाहती हैं। अलवर के समीप दादर के पास स्थित सपेरा बास की रहने वाली संगीता अपने गांव की पहली बालिका है, जिन्होंने कठिन हालातों में रहते हुए दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की है और अब बारहवीं पढ़ना चाहती है।
इस गांव में 80-90 परिवार है जो कि परंपरागत रूप से बीन बजाने, सांप पकड़ने का काम करते हैं, लेकिन अब सरकार ने सांप पकड़ने पर रोक लगा दी है, ऐसे में इनके लिए लिए जीविकोपार्जन करना कठिन हो गया है। इनमें से ज्यादातर लोग बेरेाजगार हो गए हैं, पुराने लोग अभी भी जड़ी बुटियों से दवा बनाकर और आंख का सूरमा बनाकर बेचते हैं लेकिन इससे इनका गुजारा नहीं होता है।
संगीता सपेरा ने बताया कि मेरे पिता बेरोजगार हैं। मां गांव में छोटी सी दुकान चलाती हैं। घर के आर्थिक हालात खराब हैं, पेट भरने का भी जुगाड़ मुश्किल से होता है। ऐसे में पढ़ाई के बारे में तो सोच भी नहीं सकते, लेकिन मेरे माता-पिता शुरू से ही शिक्षा को लेकर जागरुक है। उन्हें गांव के सरकारी स्कूल में प्रवेश दिलवाया और जैसे तैसे हम तीन भाई बहनों को पढ़ाया।
संगीता ने बताया कि मेरे गांव में पांचवीं तक की स्कूल है। इसके बाद पढ़ने के लिए ढाई से तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। स्कूल तक जाने वाला रास्ता बहुत खराब है। पूरा रास्ता सुनसान रहता है, ऐसे में गांव की लड़कियां पांचवीं के बाद पढ़ना छोड़ देती हैं, लेकिन मैंने आगे बढ़ने की जिद की तो माता-पिता को झुकना पड़ा, मैं पैदल ही ढाई किलोमीटर दूर पढ़ने जाती, इस तरह से आठवीं पास की।
परिवार ने पढ़ने से कर दिया था।
उसने बताया कि दसवीं की पढ़ाई के लिए बुर्जा जाना पड़ता। परिवार ने पूरी तरह से मना कर दिया, लेकिन मैंने पढ़ने की ठानी हुई थी, मैं हार नहीं मान रही थी, मैंने गांव के चार पांच बच्चों से बात की और परिजनों को समझाया तो वो समझ गए हम पांच बच्चे गांव से बाहर पढ़ने गए जिसमें मैं ही एक लड़की थी। आज सपेरा बास में दसवीं पास करने वाली पहली बालिका हूं। मैं अब गांव के बच्चों को घर पर ही पढ़ाती हूं ताकि वो भी साक्षर बनें। शुरुआत में पांच छह बच्चे ही पढ़ने आते थे। माता-पिता भेजने का तैयार नहीं थे, लेकिन बहुत प्रयास के बाद मेरी मेहनत सफल हुई और दो साल में अब 30 के लगभग बच्चे पढ़ने आ रहे हैं, जिनको स्कूल में भी प्रवेश दिलवाया है।
Published on:
19 Jan 2026 11:27 am
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