25 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

पहाड़ के कारण पड़ा गांव का नाम पहाड़ी

साबी नदी के किनारे एक छोटा से पहाड़ के पास बसा हैं गांव

2 min read
Google source verification
पहाड़ के कारण पड़ा गांव का नाम पहाड़ी

अलवर.बहरोड़ क्षेत्र के पहाड़ी गांव के पहाड़ का दृश्य।

अलवर. बहरोड़ तहसील का पहाड़ी गांव बहरोड़ से 10 किलोमीटर दूर साबी नदी के किनारे एक छोटा से पहाड़ के पास होने के कारण ही इस गांव का नाम पहाड़ी पडा। यहां पर विक्रम संवत 1125 में मोरड़ी से एक गागड़ नाम के रावत ने आकर इस गांव की स्थापना की। गागड रावत का छोटा भाई जिसका नाम कुम्भा था। जिसने गांव जैनपुरबास की स्थापना की थी। फिर इस गांव में संवत 1550 के अन्दर एक तंवर आकर बसा उस काल से ही इस गांव का विकास बढ़ता गया।

यह गांव पहले एक कच्ची बस्ती थी।लेकिन वर्तमान में इस गांव में पक्के मकान बने हुए हैं।पहाड़ी गांव में राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बना था। इस स्कूल के निर्माण में लगभग 5 बीघा तंवरों ने भूमि दान की,बाकी गांव से चंदा मिला कर दिया। उसके बाद यह विद्यालय कम्रोन्त होकर माध्यमिक बना।साल 2001 में यह उच्च माध्यमिक विद्यालय हुआ।

कुछ दिन बाद में इस विद्यालय का नाम शहीद धर्मपाल राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय किया गया और यहां पर आसपास के गांव मोहम्मदपुर,बबेड़ी,मोरोड़ी,इसराकबास के बीच यहां एक ही स्कूल थी। इससे पहले केवल बर्डोद में ही स्कूल थी जहां पर आसपास के गांवों के बच्चे पढ़ते थे। यहां अधिकांश ग्रामीण खेती का कार्य करते है गाजर की खेती के लिए भी गांव प्रसिद्व है यहां सेना सहित अन्य सेवाओ में भी गांव के लोग नौकरी करते है।


संत का श्राप भी मिला था
ग्रामीणो ने बताया कि यहां पर पड़ोस से एक टापरी गांव के एक संत आये थे। सन्त जिसका नाम (लाल भगत) जो अपने शिष्यों के साथ आया था। रात्रि होने पर संजोग से यहां पर विश्राम करना पड़ा। उस समय गांव में किसी ने विश्राम का स्थान नहीं दिया। तो इसी गांव में एक मोती लाल बनिया थे। जिसने अपने घर पर विश्राम का स्थान दिया। सुबह जाते समय सन्त लाल भगत ने एक श्राप दिया कि एक मोती बणिया की गाड़ी बचियों, बाकी सारो गांव हर अमावस्या को जलयो।

इस प्रकार यह गांव काफी साल हर अमावस्य को जलता रहा। इस उपरांत एक सरबुदास महात्मा दिलपुरा गांव से चलकर पहाड़ी आया जो अमावस्या के दो दिन पहले आया थे। जिसने देखा कि गांव वाले अपने अपने घर से सामान खुले स्थान पर निकालकर रख रहे थे। तब महात्मा ने गांव वालों से पूछा कि तुम यह समान बाहर क्यों रख रहे हो तो गांव वालों ने बताया की हर अमावस्य को गांव जलता है। इसके बाद महात्मा ने कहां की पांच पुले लेकर आओ, महात्मा ने उन पुले से एक छोटी सी झोपड़ी बनाई। जिसमे उस समय अचानक से आग लग गई। उस समय महात्मा ने अपनी शक्ति से आग को बुझाया और गांव वालों को बताया की मैं इस श्राप को समुल तो नष्ट नहीं कर सकता किंतु 1 वर्ष में एक बार गांव में आग जरूर लगेगी। यह परंपरा तब से अब तक ज्यों की त्यों चली आ रही है। जिसके बाद गांव के गिरड़ा मुकदम नाम के व्यक्ति ने 14 बीघा भूमि सरबुदास महात्मा को दान में दी। उस महात्मा ने उस भूमि में कुआं और मंदिर बनवाया और महात्मा गांव पहाड़ी में 200 वर्ष पूर्व वैशाख सुधी अष्टमी को समा गए थे।तब से ही महात्मा के नाम पर पूरा गांव वैशाख की अष्टमी को भंडारा रोट करता है और जब भी कभी ओलावृष्टी होती तो बाबा के मन्दिर में शंखनाद करने पर ओलावृष्टी बंद हो जाती है।