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अनोखी परम्परा : नौगांवा की पहचान है डोलची मार होली

ब्रज की लट्ठमार होली की तर्ज पर खेली जाती है

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अनोखी परम्परा : नौगांवा की पहचान है डोलची मार होली

अनोखी परम्परा : नौगांवा की पहचान है डोलची मार होली


हितेश भारद्वाज
नौगांवा. होली का नाम लेते ही जुबां पर बरसाने की लटठ मार और फूलों की होली का जिक्र आता है, ऐसे में नौगांवा की डोलची मार होली भी लोगों में अपनी एक अलग पहचान लिए हुए है। बदलते वक्त और बढती व्यस्तताओं के बीच भी होली अपनी उसी रंगत से जवान होती है। आज भी कुर्ता फाड और डोलचीमार होली मनाने का शौक रखने वाले लोग खुद को होली खेलने से नहीं रोक पाते है ।
राजस्थान के ङ्क्षसहद्वार एवं मेवात अंचल का कस्बा नौगांवा जहां अपने परम्परागत त्यौहारों के लिए दूर-दूर तक जाना जाता रहा है, वहीं ब्रज की लटठमार होली की तर्ज पर कस्बे की डोलची मार होली का तो कहना ही क्या। डोलची मार होली देखने को आस-पास के दर्जनों गांवों के लोग जमा होते हैं। कस्बे में यह कार्यक्रम दो दिन तक मनाया जाते हैं। होली का त्यौहार मनाने के लिए आजादी पूर्व से कस्बाई लोग जातिगत आधार पर दो भागों में विभक्त होते है ।
पहले दिन दोनों पक्षों के लोग ढोलों पर गीत ख्याल गाते हुए होलिका दहन स्थल पर पहुंचते हैं। यहां गांव के ख्ेाडापति द्वारा विधि विधान पूर्वक होलिका दहन की रस्म निभाई जाती है । यहां से चलकर सभी लोग चौपड़ा बाजार पहुंचते हैं जहां पर शुरू होता है पक्के रागों का जिकडी दंगल मुकाबला। जिकडी दंगल में कस्बे एवं दूर दराज से आए कलाकार पूरी रात सुर ताल एवं लय के साथ अपना राग अलाप कर जौहर दिखाते हैं।
जिकडी दंगल में कलाकारों में होगा मुकाबला : होली की रात्रि को बाहर से आने वाली जिकडी दंगल पार्टियों द्वारा जिकडी कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा । जिकडी दंगल में कलाकर सोनू नायक, आरती, जलङ्क्षसह भाटी, पूजा चौधरी, आशा, गौरव, शिव द्वारा प्रस्तुति दी जायेगी। कुश्ती दंगल में भी राज्यों के नामचीन पहलवान जोर आजमाइश करते है, लेकिन इस बार कुश्ती दंगल कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया गया है।

ब्रज की ल_मार होली की तर्ज पर खेली जाती है

ऐसी होती है डोलची
डोलची गिलासनुमा होती है जो नीचे से संकरी तथा ऊपर से चौडी होती है । यह लोहे या चमडे की बनी होती है,जिसमें एक लकडी का हत्था लगा होता है । डोलची में एक से डेढ लीटर तक पानी आता है। इसमें पानी भरकर तेजी से मारा जाता है और डोलची लगने के बाद सामने वाला कराह उठने को मजबूर हो जाता है।
फिर भरता है मेला
डोलची मार होली उपरान्त लोग नहा धोकर एवं खाना खाकर बाजार आते है फिर शुरू होता है मेला । आस-पास के दर्जनों गांवों से आए लोगो के मनोरंजन के लिए कुम्हार लोग भंति-भंति के स्वांग भरते है ,जिसका ग्रामीण भरपूर लुफ्त उठाते है। इन दिनों किसानों की फसल आती है उस खुशी में मेले में वो जमकर खरीदरी करते है ।

ऐसे खेली जाती है डोलची मार होली

धुलंडी पर सुबह दस बजे तक रंग गुलाल की होली खेली जाती है। दस बजे ढोल नगाडों और डीजे की धुनों के साथ नाचते गाते लोग सीताराम मन्दिर चौक के लिए रवाना होते हैं ।रास्ते में लोग इन पर रंग गुलाल डालते रहते हैं और कस्बे के लोग सीताराम मन्दिर पहुंचते हैं । मन्दिर के चौक में दो तरफ पर्याप्त मात्रा में पानी भरा जाता है। इस पानी में खेली जाती है डोलची मार होली । डोलची में पानी भरकर दूसरे पक्ष के लोगों पर तेजी से मारा जाता है । डोलची में भरे पानी की मार लटठ की मार के समान होती है । जिस पक्ष का पानी पहले समाप्त हो जाता है ,उसे हारा माना जाता है ।