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कहां चले गए भानगढ़ के भूत…देखें वीडियो

अलवर. हिंदुस्तान का सबसे खौफनाक किला...भानगढ़। यहां से चीखने, हंसने, घूंघरू जैसी आवाजें आने की कहानियां। ऊंचाई, परछाई, जंग, अकाल का यहां से जुड़ाव। यह सब सुनकर पर्यटक यहां करीब 300 वर्ष से आ-जा रहे हैं लेकिन अब धीरे-धीरे लोगों के विचारों में बदलाव आ रहा है। सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो रहा है।

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अलवर

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susheel kumar

Jun 05, 2023

ऊंचाई, परछाई, जंग, अकाल की कहानियां पीछे छूट रही, अब यहां हो रहा सकारात्मक ऊर्जा का संचार

भानगढ़…ऊंचाई, परछाई, जंग, अकाल की कहानियां पीछे छूट रहीं, अब यहां हो रहा सकारात्मक ऊर्जा का संचार

– खौफनाक किला देखने के लिए आते हैं पर्यटक, पर ऐसा यहां कुछ नहीं मिल रहा, लगातार यहां बढ़ रहे हैं पर्यटक
– यहां चार मंदिर, एक की दीवारें जर्जर, कभी भी ये गिर सकता, किले के ऊपर तक पहुंचने में चिकने पत्थर बने हैं बाधा

अलवर. हिंदुस्तान का सबसे खौफनाक किला…भानगढ़। यहां से चीखने, हंसने, घूंघरू जैसी आवाजें आने की कहानियां। ऊंचाई, परछाई, जंग, अकाल का यहां से जुड़ाव। यह सब सुनकर पर्यटक यहां करीब 300 वर्ष से आ-जा रहे हैं लेकिन अब धीरे-धीरे लोगों के विचारों में बदलाव आ रहा है। सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो रहा है। हर कोई अब यही कह रहा है कि यह केवल दिमागी वहम है। भूत-प्रेम को न कानून इजाजत देता और न कोई ऐसा सुबूत मिला जिसके जरिए किसी भूत को सजा सुनाई गई हो। हां, ये जरूर है कि यहां लगा एक बोर्ड बताता है कि भारतीय पुरातत्व विभाग को भूतों में जरूर विश्वास है। यही कारण है कि बोर्ड पर लिखा है कि सूर्यास्त के प्रवेश वर्जित है। विभाग के यहां कार्यालय स्थापित न करने का भी एक बड़ा कारण यही बताया जाता है।

उजड़े बाजार की किसी भी दुकान पर छत नहीं…हर दिन आते हैं हजारों लोग

अलवर के खौफनाक किले…हवेली की हकीकत जानने के लिए हमने भी एक दौरा किया। 20 रुपए का टिकट लिया और अंदर चलते गए। देखने में यह हवेली दूर से डरावनी जैसी लगी लेकिन मेरे दिमाग में चल रही पुरानी कहानियां भी इसका कारण हो सकती हैं। कुछ आगे बढ़े तो किले का नक्शा पत्थर पर कुरेदा गया है। पूरे किले के बारे में बताया गया है। इसको समझकर आगे बढ़े तो मुख्य रास्ते के दोनों ओर बाजार की दीवारें दिखीं जो पत्थर से बनी हुई हैं। यहां किसी भी दुकान के ऊपर छत नहीं है। रास्ते में बैठने के लिए दुकानों की चौखट हैं। कुछ जगहों पर विभाग ने बैठने को पत्थर की बेंच लगाई हैं।


कुएं कचरे से भर दिए…हवेली तक पहुंचने को रेलिंग लगाई जा रहीं
यहीं पर पास के गांव गोला का बास की 60 वर्षीय शांति देवी मिलीं। उन्होंने रोका। बोली, छोरा पाणी पी जा…अंदर ना छै। हम रुके। पानी पीए। पानी धुंधला था लेकिन मीठा था। किले के बारे में पूछा तो बोली, हमारी पूर्वज बताते थे कि भूत-प्रेत रहते थे। अंदर से डरावनी आवाजें आती थीं, लेकिन लाला हमने नहीं सुनी। कुछ आगे बढ़े तो विशाल वटवृक्ष देखा। छांव में बैठे फिर आगे बढ़े। पूरा खुला मैदान दिखा। घास उगी हुई थी। दाहिने हाथ में एक मंदिर दिखा, जिसकी दीवारें जर्जर हो रही हैं। कभी भी गिर सकती हैं। पूरब दिशा की ओर दो कुएं दिखे। दोनों में सूखा कचरा भरा मिला। बावड़ी में कुछ पानी दिखा। वहां से मिले के ऊपर जाने का रास्ता देखा। चिकने पत्थर पर पैर रखा तो फिसले लगे। यही क्रम मुख्य प्रवेशद्वार तक चला। यहां जरूर एक ग्रेल लगाई जा रही है ताकि लोग सहारे से ऊपर तक पहुंच सकें। प्रवेशद्वार के पास ही कुछ पत्थर पड़े हैं जो पौराणिक हैं, किले में प्रयोग किए गए थे। किले की प्रथम तल पर पहुंचे। इधर-उधर घूमे। आवाजें दीं लेकिन लौटकर हमारे पास ही आ रही थीं। जैसे कोई वाकई भूत या अन्य व्यक्ति बोल रहा हो।

पुरातत्व विभाग का बने कार्यालय तो विचारों में और आएगा बदलाव

करीब तीन घंटे रुकने के दौरान हमें ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला जिससे पता लग सके कि यहां भूत निवास करते हैं। खैर, ये कहानियां हैं पर यहां दिन ढलने के बाद जाने की इजाजत नहीं। यहां पर पुरातत्व विभाग का कोई कार्यालय नहीं मिला। उत्तर प्रदेश से आए पर्यटक शुभम राठौर, रुचि राठौर कहती हैं कि यहां आकर भूत जैसा कुछ लगा नहीं लेकिन दिमाग में जरूर सुनी बातें चलती रहीं पर यहां अच्छा लगा। सकारात्मकता का विकास हुआ। कहती हैं कि यहां विभाग का दफ्तर बने तो लोगों की धारणा बदल सकती है और इस किले का और उपयोग भी हो सकता है। केवल रिजर्व एरिया करने से ही काम नहीं चलेगा।

ये है इतिहास

भानगढ़ के प्राचीन नगर की स्थापना आमेर के शासक राजा भगवंत दास ने 16वीं शताब्दी में की थी। उसके बाद राजा मानसिंह के भाई माधोसिंह की रियासत राजधानी बना दिया गया। माधोसिंह मुगल सम्राट अकबर के दरबार में दीवान के पद पर कार्यरत थे। भानगढ़ के मुख्य अवशेषों में प्राचीर, द्वार, हवेलियां, मंदिर, शाही महल, छतरियां, मकबरा आदि हैं। मुख्य मंदिरों में गोपीनाथ, सोमेश्वर, केशव राय व मंगला देवी मंदिर हैं जो नागर शैली में बने हुए हैं। शाही महज सात मंजिला माना जाता है लेकिन अब इसकी चार मंजिल ही बची हैं।