
अलवर. बाजार से खरीदे गए रेडीमेड स्वेटर व जर्सी में वो गर्माहट कहां जो , मां और पत्नी के हाथ से तैयार स्वेटर या जर्सी में होती है। कहने को तो यह एक स्वेटर ही होता है । लेकिन इसका रिश्ता शरीर से ही नहीं बल्कि दिल से जुड़ जाता है हाथ के बने स्वेटर को पहनते ही मां के हाथों का प्यारा सा अहसास , उसके हाथों की गर्माहट दिल पर छा जाती है।
पर अब ना जाने ये प्यारा सा अहसास कहां खो गया है। पहले की तरह गली मौहल्ले के चबूतरों पर धूप सेकती हुई महिलाएं अब स्वेटर बुनती नजर नहीं आती है। ना ही स्कूल की मैडम हाथ में ऊन सिलाई लेकर बैठती हुई दिखाई देती है। महिलाओं का सारा समय टीवी और मोबाइल में ही निकल जाता है।
सर्दी शुरू होने से कई दिनों पहले मां, बहन या फिर भाभी हाथों में दिन हो या फिर रात ऊन व सिलाई के साथ स्वेटर बुनते हुए दिखती थी। लेकिन अब ये बीते दिनों की बात हो गई है। किसी के पास हाथ से स्वेटर बुनने का समय ही नहीं बचा है।
हाथ से स्वेटर बनाने वाली लादिया निवासी शशिबाला ने बताया कि बाजार से खरीदे गए रेडीमेड स्वेटर में भले ही सुंदर मॉर्डन डिजायन हो, बनावट में फिनिशिंग हो लेकिन इसके बाद भी ये हाथ से बने स्वेटर की गर्माहट नहीं दे सकते। एक उल्टा और एक सीधा फंदा क्या होता है आज की महिलाओं को तो शायद पता ही नहीं है। एक मां जब अपने बेटे को अपने हाथ से स्वेटर बनाती है तो इसे बनाते समय अपने प्यार और दुलार की गर्माहट भी इसमें डाल देती है। इससे तेज सर्दी भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती। जब स्वेटर बनकर तैयार होता था तो पहनने वाले से ज्यादा खुशी इसे बनाने वाले के चेहरे पर दिखाई देती । उन्होंने बताया कि मैंने इस बार नातिन और पोते पोतियों के लिए चार स्वेटर बनाएं हैं।
ब्रांडेड स्वेटर भी हाथ से बने स्वेटर की गर्माहट वापस नहीं ला सकता
दिन-रात चलती उंगलियां, छोटे बड़े नंबर की सूइयां, ऊन के रंग बिरंगे गोलों से एक फंदा सीधा, एक फंदा उल्टा करते हुए ऐसे सुंदर चित्र उभर कर आते थे कि दिल खुश हो जाता था। कभी-कभी गांव में छोटी बच्चियां अपनी मां, दादी की देखादेखी सींख वाली झाड़ू से कच्ची सिलाईयां लेकर बुनाई का हुनर सीखने लग जाती थी। मां, दादी, बहन, पत्नी के हाथ के बनाए स्वेटर से सच्चे प्यार का प्रत्यक्ष अहसास होता था। सासुजी का जवाई को पहला उपहार भी यही होता था।
कभी-कभी तो चोरी छुपे अपने प्रियतम के लिए शादी से पहले उपहार के तौर पर हाथ से बुना मफरल भी भेज दिया जाता था, जो प्रेमी इतराकर पहनता था। लगता है उस बुनाई में रिश्तों की एक अलग ही मिठास थी। इक्के दुक्के घरों को छोड़ दें तो ये अब भूली बिसरी बात होती जा रही है
Published on:
16 Jan 2018 05:32 pm
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