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World Earth Day 2019 : तार-तार हो चुकी है अरावली की ओढऩी, अगर समय रहते नहीं चेते तो दुखद होंगे परिणाम, जानिए कैसे हैं हालात

आज विश्व पृथ्वी दिवस है, लेकिन अगर इंसान यों की प्रकृति से छेड़छाड़ करता रहा, भविष्य मे हालात अच्छे नहीं होंगे।

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अलवर

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Hiren Joshi

Apr 22, 2019

World Earth Day 2019 : Aravali Mountains Are In Danger

World Earth Day 2019 : तार-तार हो चुकी है अरावली की ओढऩी, अगर समय रहते नहीं चेते तो दुखद होंगे परिणाम, जानिए कैसे हैं हालात

अलवर. तार-तार हो चुकी अरावली पर्वतमाला की ओढऩी (हरियाली) से परेशान पृथ्वी आंधी, तूफान, चक्रवात एवं कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं के जरिए मानव समाज को लगातार चेता रही है, लेकिन उन पर लेशमात्र भी असर नहीं हो रहा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अलवर जिले का हरित ताज सरिस्का बाघ अभयारण्य है। बाघों की बेशुमार संख्या वाला जंगल अब अपनी सुरक्षा के लिए अन्य स्थानों से बाघ स्थानांतरित किए जाने पर निर्भर है। जंगल की चारदीवारी का काम करने वाली अरावली पर्वतमाला अवैध खनन के चलते स्वयं लगभग लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है। इस सबको पृथ्वी दिवस पर खींची गई इन जीवंत तस्वीरों में महसूस कर सकते हैं।

पृथ्वी का सबसे बड़ा दुश्मन प्लास्टिक

पृथ्वी का सबसे बड़ा दुश्मन प्लास्टिक है। इन दिनों प्लास्टिक का चलन तेजी से बढ़ा है। इस कारण प्लास्टिक कचरे की समस्या काफी बढ़ गई है। प्लास्टिक कचरे का निस्तारण भी संभव नहीं है। प्लास्टिक व पॉलीथिन के बढ़ते प्रयोग से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ी है, इसका असर पर्यावरण पर पड़ा है।

पानी रिचार्ज के लिए हरियाली जरूरी

पानी आज की सबसे बड़ी समस्या है। प्रकृति से छेड़छाड़ व भूजल के अंधाधुंध दोहन का परिणाम है कि जिले के सभी 14 ब्लॉक डार्क जोन में शामिल हो गए हैं। पानी की कमी का मुख्य कारण अरावली पहाडिय़ों से हरियाली का गायब होना। पहाडिय़ों में जब हरियाली होगी कटान की समस्या नहीं होगी और बारिश के दिनों में जमीन में पानी का रिचार्ज भी बेहतर होगा, जिससे भूजल के स्तर में सुधार होगा और पेयजल की समस्या का निराकरण भी हो सकेगा।

खनन पर रोक से ही अरावली का संरक्षण

अलवर जिला अरावली पर्वतमाला से घिरा है। यही कारण है कि अरावली को जिले का सुरक्षा चक्र भी कहा जाता है, लेकिन निरंतर अवैध खनन से अरावली पर्वतमाला अब लुप्त प्राय: होने के कगार पर पहुंच गई है। खनन के चलते कई पहाडि़यां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं और कई खोने के कगार हैं। यदि अरावली पर्वतमाला नहीं रहेगी तो पर्यावरण संतुलन गड़बड़ाने से रोकना मुश्किल होगा।