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विश्व पर्यावरण दिवस : अलवर में न पहाड़ बचे न जंगल, बाघों के खात्मे से गड़बड़ाया पर्यावरण संतुलन

अलवर में पर्यावरण पर चारों ओर से चोट की जा रही है। यहां प्रदूषण व पॉलिथिन की वजह से शहर की स्थिति खराब हो रही है।

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अलवर

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Prem Pathak

Jun 05, 2018

World environment day : Pollution destroying condition of alwar

विश्व पर्यावरण दिवस : अलवर में न पहाड़ बचे न जंगल, बाघों के खात्मे से गड़बड़ाया पर्यावरण संतुलन

अलवर. सृष्टि निर्माण में पांच तत्वों का भले ही महत्व रहा हो, लेकिन मानवीय भूख के चलते इन पांचों तत्वों पर ही संकट मंडराने लगा है। इसका नतीजा यह हुआ कि जल, थल व नभ प्रदूषण की मार से नहीं बच पाए तो पर्यावरण संतुलन भी गड़बड़ा गया है। पर्यावरण संतुलन के लिए जल, जंगल, पहाड़, वन्यजीव एवं प्रकृति दत्त अन्य चीजें जरूरी हैं, लेकिन लोग इनका महत्व नहीं समझ पा रहे हैं। तभी तो अलवर जिले में जल सुुरक्षित है न जंगल, पहाड़ तो छलनी हो गए तो बाघ जैसे मांसाहारी वन्यजीव भी सुरक्षित नहीं रहे।

यही कारण है इन दिनों जिले का तापमान 45 डिग्री को पार कर गया तो बारिश का आंकड़ा भी घटकर औसत से आधा 250 मिलीमीटर रह गया। नतीजा यह हुआ कि पर्यावरण संतुलन गड़बड़ाने से मानव जीवन पर ही संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

पानी के लिए हाहाकार

इन दिनों पानी के लिए मच रहे हाहाकार के लिए भी प्रकृति से छेड़छाड़ जिम्मेदार है। प्रकृति से छेड़छाड़ का ही नतीजा है कि इन दिनों बारिश का औसत आंकड़ा 650 एमएम से घटकर करीब 250 एमएम तक रह गया। इसका नुकसान यह हुआ कि न पानी बरसा और न ही जमीन में पानी का रिचार्ज हो सका। नतीजतन सर्दी में भी पानी के लिए मारामारी मचने लगी। वहीं प्राकृतिक जल स्रोत जयसमंद, सिलीसेढ़ सहित जिले के अधिकतर बांधों के पेटे एवं नहरों पर अतिक्रमण ने पानी की राह ही रोक दी। यही कारण है कि जिले में साबी, रुपारेल अस्तित्व खो चुकी हैं।

वन्यजीवों की फूड चेन खत्म होने लगी

जल, जंगल, पहाड़ एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने का सीधा असर वन्यजीवों पर पड़ा। वन्यजीवों की फूड चेन प्रकृति देय है। इसमें बाघों का बड़ा महत्व है। वर्तमान में बाघों पर आए संकट से फूड चैन ही गड़बड़ाने लगी है। जिले के सरिस्का में वर्ष 2005 से पूर्व बाघों का पूरी तरह सफाया हो गया। इसका नतीजा यह रहा कि शाकाहारी वन्यजीवों की सरिस्का में संख्या एकाएक बढ़ गई।

वहीं सरिस्का में दोबारा बाघों का पुनर्वास कराया गया, लेकिन इन दिनों फिर बाघों पर संकट मंडराने लगा है। गत दिनों सरिस्का में एक बाघ का शिकार हो चुका है तो एक बाघिन लंबे समय से गायब है। बाघिन एसटी-9 की पूंछ में एक साल से ज्यादा समय से संक्रमण है। इसके अलावा भी कई अन्य बाघ इन दिनों जख्मी हालत में है। इसका नुकसान यह हो रहा है कि सरिस्का समेत जिले में शाकाहारी वन्यजीव नीलगाय की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। इससे किसानों की समस्या बढ़ गई है। इसी प्रकार, अन्य शाकाहारी जीवों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।

चहुंओर बढ़ रही प्रदूषण की समस्या

प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा जल, थल व नभ में प्रदूषण की समस्या के रूप में सामने आया है। इन दिनों अलवर जिले में वायु प्रदूषण का मानक घातक स्तर पर पहुंच चुका है, वहीं ध्वनि प्रदूषण का मानक भी बढ़ा है। प्रदूषण के मानक में वृद्धि का ही नतीजा है कि गत दीपावली पर अलवर जिले में आतिशबाजी की बिक्री पर ही रोक लगानी पड़ी।

पहाड़ों को कर दिया छलनी, जंगल हो गए साफ

पत्थर बेच रुपया कमाने के लालच में खान माफिया ने जिले में फैली अरावली पर्वतमाला को ही छलनी कर दिया। पहाड़ों के सफाये का नुकसान यह हुआ कि जिले का भौगोलिक वातावरण ही बदल गया। तापमान में वृद्धि, कम बारिश प्रकृति से छेड़छाड़ का ही नतीजा है। पहाड़ों के खत्म होने से वन्यजीवों का हैबीटाट ही खत्म हो गया। नतीजतन बाघ व अन्य वन्यजीवों को आबादी क्षेत्रों की ओर पलायन करना पड़ा, जिससे उनकी जान पर संकट बन आया है।

वहीं हर दिन कट रहे जंगल से भी प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ा गया है। हरे वृक्षों के कटने से वायुमंडल में ऑक्सीजन की कमी के साथ ही कार्बन मोनो आक्साइड, कार्बन डाई आक्साइड, मीथेन जैसी घातक गैसों का प्रभाव बढ़ गया है। इसका असर मानव जीवन पर पड़ा है।