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किसकी दिवाली- पति की आत्महत्या के बाद जूठे बर्तन साफ कर बेटियों के लिए कमा रही दो वक्त की रोटी

हर घर की तरह इस घर में नहीं मन रही दिवाली, बेटियों की बीमारी से तंग पिता ने ४ माह पूर्व कर ली थी आत्महत्या

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Woman with her 2 daughter

Woman with 2 daughter

अंबिकापुर/चिरमिरी. गरीबी भी क्या दिन दिखाती है। पिता दिहाड़ी मजदूरी करता था। इससे इतने रुपए नहीं मिलते थे कि घर का खर्च पूरा हो। समय पर खाना नहीं मिलने से 2 बेटियों की आंत में सूजन आ गई। इलाज के लिए पैसे नहीं थे, शासन-प्रशासन से भी कोई मदद नहीं मिली।

हर दिन बेटियों का रोना चेहरा देख बेबस पिता ने एक दिन ऐसा कदम उठा लिया कि परिवार और बिखर गया। उसने घर में ही फांसी लगा ली थी। चंदे के पैसे से उसे अंतिम विदाई दी गई। जब यह बात जनप्रतिनिधियों के कानों तक पहुंची तो वे दौड़े-दौड़े वहां पहुंचे। स्थानीय विधायक व जनप्रतिनिधियों ने मृतक की 2 बेटियों के इलाज व घर चलाने का वादा कर दिया।

लेकिन अब उन्हें कौन पूछता है। नेता तो नेता ही ठहरे। उस परिवार के लिए क्या दशहरा और क्या दिवाली। सब एक जैसा। पति के जाने के बाद मां अपनी दोनों बेटियों के लिए दूसरों के जूठे बर्तन साफ कर 2 वक्त की रोटी जुगाड़ करती है। दिवाली पर भी परिवार में कोई उत्साह नहीं है। आखिर ये दिवाली किसकी है?


कोरिया जिले के डोमनहिल वार्ड क्रमांक-37 में आर्थिक तंगी और बेटियों के इलाज से परेशान 50 वर्षीय कमल सरकार ने बीते 7 जुलाई को अपने घर में ही फांसी लगा ली थी। घटना के समय उसकी पत्नी अपनी दोनों बेटी लिपिका सरकार उम्र 13 वर्ष और दीपिका सरकार को लेकर जिले के मनेंद्रगढ़ शहर में इलाज के लिए गई थी। लंबे समय से बड़ी बेटी लिपिका सरकार द्वारा भोजन सही समय पर नहीं करने से उसके आंत में सूजन आ गई थी। छोटी बेटी भी इसी बीमारी की चपेट में आ गई।

कमल सरकार दिहाड़ी मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का बमुश्किल जीवन-यापन करता था। जितनी उसकी कमाई थी उससे ज्यादा उसके बेटियों के इलाज में खर्च होता था। खराब आर्थिक स्थिति से विवश होकर उसने अपनी जान दे दी। इससे परिवार और भी टूट गया।

मामले की जानकारी होने के स्थानीय लोगों सहित डोमनहिल के बंगाली समाज द्वारा आपस में चन्दा कर पीडि़त परिवार को 21 हजार 400 रुपए की मदद करते हुए दोनों बेटियों के नाम से 10-10 हजार रुपए फिक्स कर दिए और एक चालू खाता को खोलते हुए आगे और भी राशि की व्यवस्था करने की बात कही थी।


विधायक व नेता आए थे आगे
गरीब की मौत के बाद भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष लखन लाल श्रीवास्तव ने पीडि़त परिवार की बड़ी बेटी को गोद लेते हुए उसकी शिक्षा की जिम्मेदारी ली गई थी। उन्होंने परिवार को 5 हजार रुपए दिए तथा स्कूल की फीस जमा की। इधर क्षेत्रीय विधायक ने मृतक की छोटी बेटी को गोद लेते हुए उसकी जिम्मेदारी ली थी और सहायता राशि के साथ मृतक की पत्नी को काम पर लगाने की बात कही गई थी।


विधायक ने फेरा मुंह
विधायक ने पीडि़त परिवार से जो वादा किया था उसे आज तक पूरा नहीं किया। पीडि़त परिवार विधायक के निवास व कार्यालय के कई चक्कर काट दिए लेकिन सिर्फ आश्वासन देकर लौटा दिया जाता है।


घर में नहीं कोई रौनक
नेताओं के झूठे वादे को समझ चुकी मृतक की पत्नी ने अपना व बेटियों का पेट पालने के लिए दूसरों के जूठे बर्तन साफ करने शुरु कर दिए। बेटियां भी घर पर ही छोटा-मोटा काम कर मां का सहयोग करती हैं। दशहरा बीता अब दिवाली भी आ गई लेकिन घर में कोई रौनक नहीं। खपरैल मकान में रंग-रोगन भी नहीं। गांव के लोग दिवाली धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रहे हैं। बेटियां ये सब देखकर खुद को दिलासा दे रही हैं। आखिर उन्हें भी तो दिवाली धूमधाम मनाने का मन करता है लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं है।


पत्रिका से साझा की बातें
मृतक की पत्नी संगीता सरकार ने पत्रिका से चर्चा के दौरान बताया कि नेताओं से आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है। कई बार मंै अपनी बेटियों को लेकर विधायक श्याम बिहारी जयसवाल के घर गई लेकिन पहले तो वे नहीं मिले। जब मिले तो उन्होंने मुझे नगर निगम के सभापति से मिलने की बात कही।

हम जब नगर निगम गए तो सभापति ने नये कमिश्नर का हवाला देते हुए कहा कि अभी पहचान नहीं हुई है बाद में आइये। उसने बताया कि जब हम दोबारा विधायक से मिलने गए थे तो उन्होंने आश्वासन देकर चलता कर दिया। अब अपनी व बेटियों की भूख मिटाने दूसरों के घर खाना बनाने और बर्तन साफ करती है।

2 हजार रुपए महीने के मिलते हैं। इसमें क्या दिवाली मनाएं। उसने बताया कि जैसे तैसे पेट पल रहा है। आगे भगवान की मर्जी जो लिखा है वह होगा।

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