
माओवादी क्षेत्र के इस इलाके में दो वक्त की रोटी के जुगाड़ के लिए लोग कर रहे ये भयानक संघर्ष
अंबिकापुर । आजादी के 70 साल से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के दूरस्थ माओवाद प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों (Naxal Area Chhattisgarh)में लोगों के जीवन स्तर में आज भी कोई खास सुधार नहीं आ पाया है। आज भी उन्हें मूलभूत सुविधाओं के साथ राशन-पानी की समस्या से जूझना पड़(Strugging For 2 times food) रहा है। स्थिति ऐसी है कि दो वक्त की रोटी, मतलब राशन के जुगाड़ के लिए भी हर माह 20-25 किलोमीटर पैदल सफर का संघर्ष करना पड़ता है।
कुसमी विकासखण्ड के सामरी थाना अंतर्गत सुदूर ग्राम पंचायत चुनचुना व पुंदाग में ऐसा ही कुछ हाल वर्षों से बना हुआ हैं। यहां के ग्रामीण आज भी शासन से मिलने वाली राशन सामग्री लेने हर माह 20 से 25 किमी दूर जंगली रास्ते से सफर तय कर ग्राम सबाग के राशन दुकान तक आने को मजबूर हैं। चुनचुना-पुंदाग माओवाद प्रभावित क्षेत्र होने के कारण यहां विकास कार्य करना प्रशासन के लिए वर्षों से चुनौती बनी हुई है।
वैसे तो सबाग से करीब 7 किमी आगे बंदरचुआ तक सडक़ निर्माण का कार्य पूर्ण हो चुका है लेकिन उससे आगे सडक़ निर्माण कराने में माओवादी समस्या आड़े आ रही है, इस कारण यह प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन कलक्टर अवनीश शरण द्वारा ट्रैक्टर आदि वाहनों से राशन सामग्री को चुनचुना पुंदाग क्षेत्र तक भिजवाया था, लेकिन पुंदाग से लगे बूढ़ापहाड़ में माओवादियों का बेस कैंप होने से माओवादी संगठन आसानी से डीलरों को भयभीत कर भारी मात्रा में राशन सामग्री ले जाने लगे।
इससे डीलर हितग्राहियों के हिस्से के राशन में कटौती करने मजबूर हो गए। इधर राशन कम मिलने से हितग्राहियों में असंतोष फैला और वे विरोध करने लगे, तब चुनचुना-पुंदाग के राशन दुकान को फिर से सबाग पंचायत में अटैच कर दिया गया। इसके बाद से ग्रामीणों को फिर से 20 से 25 किमी दूर तक राशन(Food) लेने आना पड़ रहा है।
कुछ ग्रामीण झुंड में किराए के ट्रैक्टर वाहन में अपना राशन लेकर जाते हैं, लेकिन रास्ते के जंगली व घाट-पहाड़ होने के कारण दुर्घटना होने की संभावना बनी रहती हैं। कुछ सम्पन्न लोग बाइक से भी राशन ले जाते हैं। कुछ लोग घोड़े के माध्यम से ले जाते हैं। इसके अलावा गरीब परिवार के लोग पैदल ही ढोकर राशन ले जाने को मजबूर हैं।
अन्य ग्रामों का भी यही हाल
जिगनिया पंचायत के आश्रित ग्रामों में चुटईपाठ, आंबाकोना, कोरवा बाहुल्य गांव सुपढक़ा समेत अन्य कई पारे-मोहल्लों के ग्रामीणों को भी 8 से 12 किमी दुर्गम पहाड़ी मार्गों की दूरी तय करके राशन सामग्री समेत पंचायत से सम्बंधित कार्यों के लिए जिगनिया तक आना पड़ता है। यही हाल अमरपुर पंचायत के आश्रित ग्राम भुलसी खुर्द, चंपानगर समेत अन्य पाठ क्षेत्र के पारा-मोहल्लों का भी है। ग्राम पंचायत हर्री के आश्रित ग्राम पकरी टोला, भलघुटरी, कुढऩ पानी समेत अन्य पाठ क्षेत्र के ग्रामीणों को भी राशन सामग्री(food items) समेत अन्य कार्यों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
कुसमी एसडीएम बालेश्वर राम का कहना है - राशन का भंडारण चुनचुना या पुंदाग में करने से माओवादी डीलरों को डरा-धमकाकर राशन लूट ले जाते हैं, इस कारण फिलहाल यही व्यवस्था कायम रहेगी। अमरपुर व हर्री, जिगनिया, चैनपुर आदि पंचायतों में ग्रामीणों की सुविधा के लिए फूड ऑफिसर से चर्चा कर व्यवस्था बनाने का प्रयास करेंगे।
Published on:
26 May 2019 06:02 am
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