नया शोध : अटकामा पठार में ज्वालामुखियों के शुष्क शिखरों पर मिले चूहों के कंकाल, 6,000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर स्तनधारी जीवन की धारणा बदली
वॉशिंगटन. मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाओं को लेकर चल रहे अध्ययन के बीच वैज्ञानिकों ने कहा है कि चूहे मंगल ग्रह पर भी जिंदा रह सकते हैं। यह दावा नए शोध के आधार पर किया गया। वैज्ञानिकों को चिली और अर्जेंटीना के अटकामा पठार में ज्वालामुखियों के बेहद शुष्क शिखरों पर कुछ चूहों के कंकाल मिले हैं। वातावरण और कम तापमान के कारण अटकामा पठार को मंगल ग्रह से काफी मिलता-जुलता इलाका माना जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ज्वालामुखियों के शिखर पर चूहों की खोज से संकेत मिलते हैं कि स्तनधारी मंगल ग्रह पर रह सकते हैं।
द डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक अटकामा की जलवायु इतनी जटिल है कि नासा के वैज्ञानिक मंगल ग्रह पर जीवन की खोज का अभ्यास करने वहां गए थे। पहले वैज्ञानिकों की धारणा थी कि समुद्र तल से 6,000 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई वाली जगह स्तनधारी जीवन संभव नहीं है। अटकामा पठार पर चूहों के कंकाल मिलने के बाद यह धारणा बदल गई है। शोध के लेखक अमरीका के नेब्रास्का विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जे. स्टोर्ज का कहना है कि यह हैरानी की बात है कि स्तनधारी जीव ज्वालामुखियों के शिखर जैसे दुर्गमा इलाके में रह सकते हैं। प्रशिक्षित पर्वतारोही भी इतनी ऊंचाई पर एक दिन से ज्यादा नहीं रह सकते। चूहों का इतनी ऊंचाई पर रहना दर्शाता है कि हमने इन छोटे स्तनधारियों की शारीरिक सहनशीलता को कम आंका है।
कम ऑक्सीजन और तापमान में भी रहे जिंदा
वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान 21 ज्वालामुखी शिखरों की जांच की। इनमें 6,000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई वाले 18 शिखर शामिल थे। इन शिखर पर 13 चूहों के कंकाल मिले। रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि चूहों के अवशेष कुछ दशक पुराने थे। ये चूहे फाइलोटिस वैकैरम नाम की प्रजाति के थे। ये ऐसे बंजर इलाके में रहे, जहां तापमान शून्य से ऊपर नहीं जाता और ऑक्सीजन बेहद कम होती है।
2020 में मिले सबूत ने खोला रास्ता
प्रोफेसर जे. स्टोर्ज और उनके पर्वतारोही साथी मारियो पेरेज ममानी ने 2020 की शुरुआत में चिली-अर्जेंटीना सीमा पर ज्वालामुखी लुल्लाइलाको की 22,000 फुट ऊंची चोटी पर एक कान वाले चूहे के जिंदा होने का सबूत पाया था। इससे पहले इतनी ज्यादा ऊंचाई पर कोई स्तनधारी जीव नहीं पाया गया था। इसी खोज ने स्टोर्ज की अगुवाई में वैज्ञानिकों की टीम को अटकामा पठार इलाके में शोध के लिए प्रेरित किया।