"कई जीत बाक़ी हैं कई हार बाक़ी हैं अभी ज़िंदगी का सार बाक़ी है। यहाँ से चले हैं नयी मंज़िल के लिए ये तो एक पन्ना था अभी तो पूरी किताब बाक़ी है"।
अमेरिका के न्यूजर्सी में रहने वाले 13 साल के स्पर्श शाह की जिंदगी पर यह लाइन बिल्कुल सटीक बैठती है। कहने को तो स्पर्श भी उन लाखों करोड़ों दिव्यांगों के जैसे ही हैं, लेकिन उनका आत्मविस्वास, साहस और कुछ कर गुजरने का जज्बा उन लाखों बच्चों के लिए एक प्रेरणा है जो जिंदगी के फ़लसफ़े में खुद को खुद से ही हारा हुआ घोषित कर लेते हैं। इतनी छोटी सी उर्म के स्पर्श जो अब तक 100 से ज्यादा फ्रैक्चर झेल चूका है, जरा सोचिये उसके माँ-बाप पर क्या गुजरती होगी, जो उसे अपनी गोद में भी नहीं ले सकते।