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Navratri Special : महाभारत काल का है यूपी का ये चमत्कारिक मंदिर, जहां दर्शन मात्र से ही हो जाते सारे कष्ट दूर

यूपी के अमेठी में मां अहोरवा भवानी का एक ऐसा प्राचीन मंदिर जहां शारदीय नवरात्रि में एक बार दर्शन मात्र से ही लोगों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

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Navratri 2018 special ahorwa bhawani Miracle temple in up

Navratri Special : यूपी का एक ऐसा चमत्कारिक मंदिर, जहां दर्शन मात्र से ही हो जाते सारे कष्ट दूर

अमेठी. यूपी के अमेठी में मां अहोरवा भवानी का एक ऐसा प्राचीन मंदिर जहां शारदीय नवरात्रि में एक बार दर्शन मात्र से ही लोगों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। मंदिर में मां अहोरवा भवानी की प्राचीन मूर्ति स्थापित है जो नवरात्रि के दिनों में दिन में 3 रूपों में परिवर्तित होती हैं। सुबह के समय बाल रूपम में, दोपहर के समय युवावस्था के रूप में और शाम के समय वृद्धरूप में नजर आती हैं।

अमेठी से 65 किलोमीटर दूर है यह मन्दिर

अमेठी से 65 किलोमीटर दूर रायबरेली से इन्हौना मार्ग पर सिंहपुर ब्लाक में मां अहोरवा भवानी का मंदिर स्थापित है। जहां शारदीय नवरात्रि में एक बार दर्शन करने से ही सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और मां अहोरवा भवानी भी सभी के कष्टों को हर लेंती हैं। बताया जाता है कि मां अहोरवा भवानी की मूर्ती इतनी चमत्कारिक हैं कि मां के दिव्य दर्शन और रहस्य को देखने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। दर्शन करने वाले बताते हैं कि मंदिर में जो मां अहोरवा भवानी की प्रतिमा रखी है वह पृथ्वी से ही उत्पन्न हुई है और मूर्ति का कोई भी निर्माण नहीं किया गया।

अर्जुन को हुए थे दिव्य स्वरूप माता के दर्शन

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बताया जाता है कि जब 5 पांडव वनवास के दौरान यहां पर अज्ञातवास का समय बिता रहे थे तो वह पांचों पांडव इसी क्षेत्र में काफी लम्बे समय तक रुके थे। जब पांचों पांडव में से एक दिन जंगल में अर्जुन शिकार के लिए निकलते है तो वहां उनको जंगलों के बीचो-बीच दिव्य स्वरूप माता के दर्शन प्राप्त हुए थे। वह दिव्य स्वरूप माता के दर्शन करके वहां से वापस लौट आए थे। जब अर्जुन ने उस मंदिर और उसमें विराज हुई माता के विषय में अपने चारों भाइयों को बताया तो सभी ने उनका दर्शन कर पूजा अर्चना की। महाभारत में भी इस मंदिर और माता का उल्लेख स्पष्ट शब्दों में किया गया है।

लोगों का मानना है यह

जबकि लोगों का मानना है कि माता के लिए इस भव्य मंदिर का निर्माण स्वयं पाचों पांडवों ने मिलकर किया था। लेकिन समय के साथ ही मंदिर में प्रतिमा विलुप्त हो गई फिर कालांतर स्थानीय व्यक्ति अहोरवा नामक पाल बिरादरी के व्यक्ति ने स्वपन में मां की मूर्ति को देखा, उसके बाद मां की खोज की गई जिसके बाद से इस मंदिर को अहोरवा भवानी के नाम से जाना जाने लगा और धूमधाम से पूजा की जानी लगी। इसके साथ ही अन्य स्थानों से भी भक्त मां के दर्शन के लिए दूर दूर से आते हैं।