मनुष्य जीवन भी एक प्रतिध्वनि की तरह है। यदि तुम चाहते हो कि लोग तुमसे प्रेम करें, तो तुम भी दूसरों से प्रेम करो।
एक लड़का था। वह प्रतिध्वनि के संबंध में कुछ भी नहीं जानता था। एक बार वह जंगल में चिल्लाया तो उसे लगा कि पास ही कोई दूसरा लड़का भी चिल्ला रहा है। उसने उससे कहा- इधर तो आओ।
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उधर से आवाज आई- इधर तो आओ। लड़ने कहा- कौन हो तुम? आवाज ने भी कहा- कौन हो तुम? लड़के ने उसे डांटा- तुम बहुत खराब लड़के को। आवाज ने भी उसी तरह डांटा- तुम बहुत खराब लड़के हो।
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लड़का घबराया और जंगल से घर लौट आया। उसने अपनी मां को सारी घटना बताई- मां, जंगल में एक बहुत खराब लड़का लड़का रहता है। वह हू-ब-हू मेरी नकल करता है। जो मैं कहता हूं, वह भी वही कहता है। मैं जैसे चिल्लाता हूं, वह भी वैसे ही चिल्लाता है।
उसकी मां समझ गई कि मामला क्या है। उसने अपने बेटे से कहा- तुम उस लड़के से विनम्रतापूर्वक बोलो। यदि तुम नम्रतापूर्वक बोलोगे तो वह भी तुमसे नम्रतापूर्वक बोलेगा।
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लड़का फिर उसी जंगल में गया। वहां उसने जोर से कहा- तुम बहुत अच्छे हो। उधर से आवाज आई- तुम बहुत अच्छे हो। लड़के ने और जोर देकर कहा- मैं तुमसे प्यार करता हूं। उधर से भी आवाज आई- मैं तुमसे प्यार करता हूं।
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सीख
मनुष्य जीवन भी एक प्रतिध्वनि की तरह है। यदि तुम चाहते हो कि लोग तुमसे प्रेम करें, तो तुम भी दूसरों से प्रेम करो। तुम जिससे भी मिलो, मुस्कुराते हुए मिलो। तुमको मुस्कुराता हुआ देखकर वह भी मुस्कुराएगा और फिर मुस्कुराहट ही मुस्कुराहट नजर आएगी।
प्रस्तुतिः सतीश चंद्र अग्रवाल
आनंद वृंदावन, संजय प्लेस, आगरा