
Neem Karoli Baba: कैंची धाम वाले नीम करोली बाबा को आज पूरी दुनिया जानती है। देश ही नहीं बल्कि विदेशों के बड़े-बड़े दिग्गज भी उनके आगे शीश झुकाते हैं। 11 सितंबर, 1973 को उन्होंने वृंदावन में अपने शरीर का त्याग किया था। बाबा को कलयुग में भगवान हनुमान का अंश माना जाता है। उनकी पुण्यतिथि पर आइए जानते हैं कि आखिर आगरा के एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में जन्मे लक्ष्मीनारायण कैसे दुनिया-भर में नीम करोली बाबा के नाम से प्रसिद्ध हो गए।
नीम करोली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के अकबरपुर गांव में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम लक्ष्मीनारायण बताया जाता है। किशोरावस्था में ही उन्होंने घर की सुख-सुविधाएं छोड़कर आध्यात्मिक जीवन की राह अपना ली थी। कहा जाता है कि बाबा गुजरात के मौरवी के पास बबानियां गांव पहुंचे। यहां उन्होंने एक वैष्णव संत से करीब 6 से 7 साल तक साधना की। इस दौरान वे लंबे समय तक तालाब में गर्दन तक पानी में खड़े होकर साधना करते थे। इसी वजह से उन्हें तलैय्या बाबा के नाम से भी जाना जाने लगा।
नीम करोली बाबा की हनुमान भक्ति की काफी चर्चा होती है साथ ही उन्हें हनुमान जी का बड़ा भक्त माना जाता है। उन्होंने बबानियां गांव में तालाब के किनारे हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की थी जहां आज एक भव्य मंदिर है। बाबा की हनुमान भक्ति और सेवा-भाव इतना गहरा था कि उनके भक्त उन्हें हनुमान जी का ही अवतार मानने लगे। आज भी उन्हें कलयुग में हनुमान जी का अंश कहकर पूरी श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।
साल 1916 के आसपास बाबा बबानियां से निकलकर उत्तर भारत के 'नीब करौरी गांव' पहुंचे। यहीं से उनका नाम हमेशा के लिए बदल गया। इसी गांव से जुड़ा एक प्रसिद्ध रेल प्रसंग भी उनके जीवन की चर्चित कथाओं में शामिल है। कहा जाता है कि एक बार बाबा बिना टिकट ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में बैठ गए। टिकट कलेक्टर ने जब उन्हें बिना टिकट देखा तो अगले स्टेशन यानी नीब करौरी गांव के पास उन्हें ट्रेन से नीचे उतार दिया। लेकिन बाबा के उतरने के बाद ट्रेन का इंजन चालू ही नहीं हुआ।
लाख कोशिशों के बाद भी जब ट्रेन नहीं चली, तब उसमें मौजूद यात्रियों ने बाबा से दोबारा ट्रेन में आने की विनती की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद यात्रियों ने टीटी को बाबा के चमत्कारों के बारे में बताया और उनसे क्षमा मांगने के लिए कहा। यात्रियों के कहने पर टीटी और अंग्रेज अफसर बाबा के पास पहुंचे और उनसे मांफी मांगी। भक्तों के अनुसार, जैसे ही बाबा वापस ट्रेन में बैठे ट्रेन तुरंत चल पड़ी। इसी घटना के बाद लोग उन्हें नीब करौरी बाबा कहने लगे जो बाद में नीम करोली बाबा हो गया।
बताया जाता है कि बाबा ट्रेन में दोबारा बैठने को राजी तो हो गए, लेकिन उन्होंने अफसरों के सामने दो शर्तें रखीं। पहली शर्त थी कि कभी भी किसी साधु-संत को अपमानित करके ट्रेन से बाहर नहीं निकाला जाएगा और दूसरी कि नीब करौरी गांव, जहां बाबा को उतारा था, वहां एक रेलवे स्टेशन बनाया जाएगा। बाबा की दोनों शर्तें मान ली गईं और उस जगह पर एक नया रेलवे स्टेशन बनाया गया, जिसे नाम नीब करौरी रेलवे स्टेशन के नाम से जाना जाता है।
साल 1935 के बाद बाबा का भ्रमण और भक्तों से जुड़ाव बहुत ज्यादा बढ़ गया। वे एक जगह ज्यादा देर नहीं रुकते थे। उन्होंने उत्तराखंड के कैंची धाम, वृंदावन, हनुमानगढ़ और भूमियाधार जैसे स्थानों को अपनी साधना का केंद्र बनाया। इनमें कैंची धाम आज बाबा के सबसे प्रसिद्ध आश्रमों में से एक है जहां एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स से लेकर फेसबुक के मार्क जकरबर्ग तक सुकून की तलाश में आ चुके हैं। यहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
नीम करोली बाबा का जीवन बेहद साधारण था। वे दिखावे से कोसों दूर रहते थे। वे हमेशा लोगों को भगवान राम का नाम लेने और जरूरतमंदों की मदद करने की प्रेरणा देते थे। बाबा अक्सर राम नाम लिखा करते थे। बाबा का मानना था कि राम नाम जपने से जीवन की हर बड़ी मुश्किल आसान हो जाती है। उनके लिए भक्ति सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं थी. लोगों की सेवा और जरूरतमंदों की मदद को भी वे भक्ति का हिस्सा मानते थे।
नीम करोली बाबा ने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन के राम कृष्ण मिशन अस्पताल में बाबा ने महासमाधि ले ली लेकिन आज भी वह लाखों करोड़ों भक्तों के दिलों में एक सच्चे गुरु और मार्गदर्शक बनकर जीवित हैं। उनके निधन के बाद भी कैंची धाम और देश के दूसरे आश्रमों में उनकी स्मृति और पूजा की परंपरा जारी है। आज भी भक्त बाबा को अपने गुरु, मार्गदर्शक और हनुमान भक्त के रूप में याद करते हैं।